(भाग 4) बिहारी समाज प्रवासी बनकर कब तक सहते रहेंगे अपमान आपसी मतभेद को त्यागे

 

 

“बॉम्बे का बिहारी” (भाग ४):- मुंबई और इसके आसपास के शहरों—जैसे ठाणे, मीरा-भाईंदर, वसई-विरार, नवी मुंबई, कल्याण-डोंबिवली आदि—में आगामी नगर निकाय चुनावों के मद्देनजर यहां बसे बिहारियों की राजनीतिक पहचान, सक्रियता, वर्तमान दशा और भविष्य की दिशा को समझना बेहद जरूरी है। इस श्रृंखला में हम इसी विषय पर गहराई से चर्चा कर रहे हैं, और अब हम ‘बिहार प्रकोष्ठ’ के इतिहास पर प्रकाश डालेंगे। यह प्रकोष्ठ महाराष्ट्र की राजनीति में बिहारियों की भूमिका को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बना, लेकिन इसका सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा। आइए, इसकी स्थापना, चुनौतियों और विकास की कहानी को विस्तार से जानते हैं।

महाराष्ट्र की राजनीति में बिहारियों की यात्रा हमेशा से ही संघर्षमय रही है। स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक, वे मुख्यधारा की राजनीति में अपनी मजबूत पैठ बनाने के लिए जूझते रहे। शुरुआती दौर में कांग्रेस का प्रभुत्व था, जहां बिहारियों को या तो अदृश्य रखा जाता था या फिर उन्हें उत्तर भारतीयों के एक समूह के रूप में देखा जाता था। बाद में, जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना का गठबंधन मजबूत हुआ, तब भी बिहारियों की भूमिका ज्यादातर सहायक या माध्यमिक ही रही। भाजपा के भीतर ‘उत्तर भारतीय मोर्चा’ नामक एक इकाई थी, जो मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के प्रवासियों के हितों को संरक्षित करती थी। अगर कोई बिहारी नेता राजनीतिक गतिविधियां या सामाजिक कार्य करता भी, तो उसका श्रेय अक्सर उत्तर भारतीय मोर्चा के खाते में चला जाता। बिहारियों की अलग पहचान और उनकी विशिष्ट समस्याओं—जैसे रोजगार, आवास, शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण—को नजरअंदाज किया जाता रहा। इस वजह से बिहारियों में एक तरह की राजनीतिक हताशा और अलगाव की भावना पनपती गई।

हालांकि, करीब दो दशक पहले—करीब २००३-४ के आसपास—एक महत्वपूर्ण मोड़ आया, जिसने बिहारियों की राजनीतिक यात्रा को नई दिशा दी। उस समय केंद्र में स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार थी, और भाजपा कई राज्यों—जैसे गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड—में सत्ता में थी। पार्टी अपनी विस्तारवादी नीति के तहत नए क्षेत्रों में पैठ बनाने की कोशिश कर रही थी। बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) के साथ गठबंधन किया गया, और महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव नजदीक थे, और भाजपा को मुंबई जैसे महानगर में उत्तर भारतीय मतदाताओं—खासकर बिहारियों—का समर्थन जुटाने की जरूरत महसूस हुई।

इस संदर्भ में, भाजपा के कद्दावर नेता स्वर्गीय प्रमोद महाजन की भूमिका अहम रही। महाजन जी का बिहार की राजनीति और वहां के नेताओं से गहरा तालमेल था। उस समय मुंबई भाजपा इकाई के प्रधान विजय गिरकर थे। आगामी चुनावों को देखते हुए, बिहार भाजपा संगठन के कुछ नेता मुंबई आए। प्रमोद महाजन जी की सिफारिश और महाराष्ट्र भाजपा के वरिष्ठ नेता किरीट सोमैया के सक्रिय सहयोग से, भाजपा में ‘बिहार प्रकोष्ठ’ का गठन किया गया। यह प्रकोष्ठ विशेष रूप से मुंबई में बसे बिहारियों के लिए था, ताकि उनकी आवाज को संगठित रूप से उठाया जा सके। प्रकोष्ठ की स्थापना के साथ ही इसके पहले अध्यक्ष (पश्चिमी ट्रैक के लिए) मोहन मिश्रा को और महामंत्री (पूर्वी ट्रैक के लिए) चक्रधर झा को चुना गया। ये दोनों उस समय भाजपा के जिला स्तरीय कार्यकर्ता थे। दादर स्थित भाजपा के मुंबई कार्यालय में बिहार प्रकोष्ठ को एक अलग केबिन आवंटित किया गया, जो इसके औपचारिक अस्तित्व का प्रतीक था।

बिहार प्रकोष्ठ का मुख्य उद्देश्य मुंबई में रहने वाले लाखों बिहारियों को राजनीतिक रूप से संगठित करना था। यह उनके दैनिक जीवन की समस्याओं—जैसे प्रवासी मजदूरों के अधिकार, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा की पहुंच और सांस्कृतिक कार्यक्रमों—को उठाने का माध्यम बनना था। साथ ही, यह बिहारियों की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाने और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने का प्रयास था। प्रकोष्ठ के माध्यम से चुनावों में बिहारी मतदाताओं को भाजपा की ओर आकर्षित करने की योजना थी, ताकि पार्टी की जीत में उनका योगदान सुनिश्चित हो सके। शुरू में इसकी स्थापना से बिहारियों में उत्साह का संचार हुआ, और लगा कि अब उनकी राजनीतिक पहचान मजबूत होगी।

लेकिन दुर्भाग्य से, जिस उम्मीद और उत्साह के साथ बिहार प्रकोष्ठ की स्थापना हुई, वैसा कुछ हासिल नहीं हो सका। अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति अक्सर निष्क्रिय और आत्ममुग्ध रहते, जैसे ‘स्थितिप्रज्ञ’ की अवस्था में। कर्तव्य और जिम्मेदारी के बीच की विसंगति ने प्रकोष्ठ को फलने-फूलने से रोक दिया। संगठनात्मक सक्रियता की कमी, आंतरिक कलह और बाहरी हस्तक्षेप ने इसे कमजोर कर दिया। इसी बीच महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव संपन्न हुए, लेकिन भाजपा सरकार बनाने में असफल रही। उत्तर भारतीय मोर्चा के नेताओं का प्रतिस्पर्धी और द्वेषपूर्ण हस्तक्षेप—या फिर अध्यक्ष की अक्षमता—जो भी कहें, बिहार प्रकोष्ठ धीरे-धीरे नेपथ्य में चला गया। यह अपनी अंतिम सांसें गिनने लगा, और लगने लगा कि यह जल्द ही समाप्त हो जाएगा।

इस दौरान बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। वहां लालू प्रसाद यादव की सरकार को सत्ता से हटाकर, भाजपा ने नीतीश कुमार के साथ मिलकर एनडीए की सरकार बनाई। इस सफलता का असर मुंबई के राजनीतिक माहौल पर भी पड़ा। बिहारियों में नई जागृति आई, और मुंबई भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष गोपाल शेट्टी के सामने चक्रधर झा ने बिहार प्रकोष्ठ की दुर्दशा को उठाया। हालांकि, शेट्टी जी ने प्रकोष्ठ की निष्क्रियता के कारणों को गहराई से समझे बिना, उत्तर भारतीय मोर्चा के नेताओं की सलाह पर काम किया। संगठनात्मक संरचना में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया, और दूसरे कार्यकाल के लिए भी मोहन मिश्रा को ही अध्यक्ष बनाया गया। नतीजा वही रहा—कोई प्रगति नहीं, सिर्फ नाममात्र की मौजूदगी। यह ‘ढाक के तीन पात’ जैसी स्थिति थी, जहां सब कुछ वैसा ही रहा जैसा पहले था।

इस तरह, बिहार प्रकोष्ठ के गठन के बाद दूसरा महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव भी बीत गया, और भाजपा फिर सत्ता से बाहर रही। प्रकोष्ठ लगभग लुप्तप्राय हो चुका था, और बिहारियों की राजनीतिक आकांक्षाएं अधर में लटक गईं। लेकिन जल्द ही एक नया बदलाव आया। मुंबई भाजपा के अध्यक्ष पद पर विधायक राजपुरोहित को नियुक्त किया गया। आगामी चुनावों को देखते हुए, उनका ध्यान बिहारी मतदाताओं पर केंद्रित हुआ। उन्होंने बिहार प्रकोष्ठ को खोजा और उसकी संगठनात्मक संरचना में आवश्यक बदलाव किए। यह बदलाव मृत्यु के मुहाने पर खड़े प्रकोष्ठ के लिए संजीवनी बूटी साबित हुआ। इससे प्रकोष्ठ में नई ऊर्जा का संचार हुआ, और यह फिर से सक्रिय होने लगा।

इस श्रृंखला के अगले भाग में हम चक्रधर झा की अध्यक्षता में बिहार प्रकोष्ठ की उन्नति पर चर्चा करेंगे। हम देखेंगे कि कैसे इसने बिहारियों के राजनीतिक वर्चस्व को मजबूत किया, वर्तमान समय में प्रकोष्ठ की क्या स्थिति है, और बिहारियों की राजनीतिक दशा में क्या सुधार आया है। क्या यह प्रकोष्ठ बिहारियों को मुख्यधारा की राजनीति में मजबूत स्थान दिला पाया है? या अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं—जैसे आंतरिक कलह, बाहरी हस्तक्षेप और संसाधनों की कमी? इन सवालों के जवाब और गहन विश्लेषण अगले भाग में।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *