
इन दिनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कुछ लोग, जो खुद को भीम आर्मी से जुड़े होने का दावा करते हैं, डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम का दुरुपयोग करते हुए मनुस्मृति के बारे में आधारहीन और भ्रामक बातें फैला रहे हैं। वे न केवल इस प्राचीन ग्रंथ की आलोचना करते हैं, बल्कि इसे सार्वजनिक रूप से जलाने जैसी आपत्तिजनक गतिविधियों में भी संलग्न दिखाई दे रहे हैं। यह व्यवहार न केवल सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के प्रति असम्मान का प्रतीक भी है।
वास्तविकता यह है कि ऐसे तथाकथित कार्यकर्ताओं का भारतीय संविधान, डॉ. अंबेडकर की विचारधारा या दलित समुदाय के उत्थान से कोई वास्तविक सरोकार नहीं है। वे जातिवादी के गंदगी युक्त मानसिकता की उपज हैं, जो मौसमी कीड़ों की भांति समाज में विषाक्तता फैलाने का कार्य करते हैं। उनकी ये हरकतें सामाजिक सद्भावना और समरसता को कमजोर करने वाली हैं, जो अंततः पूरे समाज को विभाजित करने का प्रयास करती हैं। डॉ. अंबेडकर ने खुद संविधान निर्माण के दौरान समानता, न्याय और भाईचारे पर जोर दिया था, लेकिन ऐसे लोग उनके नाम का सहारा लेकर ठीक इसके विपरीत कार्य कर रहे हैं, जो उनकी विरासत का अपमान है।
मनुस्मृति सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक ग्रंथ है, जो प्राचीन भारतीय समाज की व्यवस्था और नैतिक मूल्यों को दर्शाता है। सनातनी समाज खुद को मनु महाराज की संतान मानता है, और इस ग्रंथ पर कोई अनुचित टिप्पणी या हमला सनातन परंपरा और उसके अनुयायियों पर सीधा प्रहार है। यदि किसी व्यक्ति को मनुस्मृति की शिक्षाएं या सामग्री पसंद नहीं आती, तो वे इसे पढ़ने से परहेज कर सकते हैं—यह उनका व्यक्तिगत अधिकार है। लेकिन इसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करना, झूठी अफवाहें फैलाना या जलाना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि कानूनी दृष्टि से भी अपराध है।
भारतीय संविधान की धारा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करती है, लेकिन यह धारा स्वतंत्रता, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और अन्य धर्मों के प्रति सम्मान बनाए रखने की शर्तों पर सीमित है। ऐसे में, धार्मिक ग्रंथों का अपमान धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कार्य है, जो भारतीय दंड संहिता की धारा के अंतर्गत दंडनीय है।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि देश में धार्मिक ग्रंथों या महापुरुषों के सार्वजनिक अपमान की ऐसी घटनाएं मुख्य रूप से हिंदू धर्म से जुड़े ग्रंथों और प्रतीकों के साथ ही देखने को मिलती हैं। अन्य धर्मों के पवित्र ग्रंथों—जैसे कुरान, बाइबिल या गुरु ग्रंथ साहिब—के साथ सार्वजनिक रूप से ऐसा व्यवहार शायद ही कभी होता है, क्योंकि समाज और कानून दोनों ही स्तरों पर ऐसी घटनाओं पर त्वरित और कड़ी प्रतिक्रिया होती है। यह असमानता सामाजिक समरसता के लिए चुनौतीपूर्ण है और सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
इस प्रकार की विषाक्त गतिविधियां समाज में नफरत और विभाजन को बढ़ावा देती हैं, जो अंततः राष्ट्रीय एकता को कमजोर करती हैं। इसलिए, सरकार को इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए संवैधानिक और कानूनी ढांचे के भीतर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे तत्वों पर सख्त निगरानी रखी जाए, और आवश्यकता पड़ने पर कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से उन्हें जवाबदेह बनाया जाए। इससे समाज में सकारात्मक वातावरण बनेगा, और सामाजिक समरसता को मजबूती मिलेगी। अंत में, हमें याद रखना चाहिए कि सच्ची प्रगति तभी संभव है जब हम अपनी सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करें और एक-दूसरे की भावनाओं का आदर करें।
हम सबको मिलकर अपनी सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करना होगा और एक-दूसरे की भावनाओं का आदर करना होगा। तभी सच्ची सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी।