
“बॉम्बे का बिहारी” (भाग ५):- इस कड़ी में हम मुंबई में रहने वाले बिहारियों के लिए भाजपा के बिहार प्रकोष्ठ के उस स्वर्णिम काल की चर्चा करेंगे, जब यह प्रकोष्ठ संगठित होकर बिहारियों को राजनीतिक पहचान और महत्व दिलाने में सफल रहा। यह दौर मुंबई की राजनीति में बिहारी समुदाय के उत्थान का प्रतीक माना जा सकता है।
बिहार प्रकोष्ठ के गठन के बाद शुरुआती दस वर्षों तक यह लगभग निष्क्रिय और बेजान सा रहा। इस दौरान महाराष्ट्र विधानसभा के दो चुनाव बीत गए, और भाजपा सत्ता से बाहर रही। प्रकोष्ठ धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो चुका था, तथा मुंबई में बसने वाले बिहारियों की राजनीतिक आकांक्षाएं अधर में लटकी हुई थीं। बिहारी मतदाताओं की बड़ी संख्या के बावजूद, उनकी संगठित आवाज नहीं बन पा रही थी।
लेकिन समय के साथ एक नया बदलाव आया। यह बदलाव २०१४ के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले का है, यानी लगभग १३-१४ वर्ष पूर्व की बात। उस समय मुंबई भाजपा के अध्यक्ष पद पर विधायक राज पुरोहित जी को नियुक्त किया गया। आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए, उनका फोकस बिहारी मतदाताओं की बड़ी आबादी पर गया, जो मुंबई की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकते थे। उन्होंने बिहार प्रकोष्ठ को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया और इसकी संगठनात्मक संरचना में जरूरी सुधार किए।
राज पुरोहित जी के कार्यकाल में बिहार प्रकोष्ठ के अध्यक्ष का चुनाव कराया गया, जिसमें श्री चक्रधर झा जी का चयन हुआ। यह नियुक्ति मृतप्राय प्रकोष्ठ के लिए संजीवनी बूटी साबित हुई। चक्रधर झा जी के नेतृत्व में प्रकोष्ठ में नई ऊर्जा का संचार हुआ और यह तेजी से सक्रिय हो गया।
अध्यक्ष बनते ही चक्रधर झा जी ने मुंबई की सभी छह लोकसभा क्षेत्रों में घूम-घूमकर बिहारी समुदाय के लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया। उन्होंने मजबूत सांगठनिक ढांचा खड़ा किया – वार्ड स्तर से लेकर मंडल, जिला और विधानसभा स्तर तक अध्यक्ष नियुक्त किए, साथ ही सैकड़ों सक्रिय कार्यकर्ताओं की एक मजबूत टीम तैयार की। उनकी अथक मेहनत का नतीजा यह हुआ कि मुंबई भाजपा कार्यालय से लेकर जिला और वार्ड स्तर तक बिहार प्रकोष्ठ के कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित होने लगे।
इस सक्रियता का असर सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं रहा। अन्य राजनीतिक दलों ने भी बिहारी मतदाताओं को महत्व देना शुरू कर दिया। बिहारियों को मुख्यधारा की राजनीति में मजबूत जगह मिलने लगी। संयोगवश या उनके संगठन के बल पर, ठीक उसी समय भाजपा २०१४ के विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करने में सफल रही, जिसमें बिहारी वोटों की भूमिका अहम मानी जाती है।
इसके बाद कुछ वर्षों तक बिहार प्रकोष्ठ अपनी मजबूती बनाए रखने में सफल रहा। लेकिन दुर्भाग्य से, यह अतिमहत्वाकांक्षी और स्वार्थी तत्वों के कुचक्र का शिकार हो गया। बाद के अध्यक्ष चुनाव में चक्रधर झा जी की जगह एक गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले और अपेक्षाकृत अयोग्य व्यक्ति ने किसी तरह कुर्सी हथिया ली।
इस राजनीतिक तिकड़म का परिणाम विनाशकारी रहा। नए अध्यक्ष येन-केन-प्रकारेण पद तो हासिल कर लिया, लेकिन प्रकोष्ठ लावारिस और निष्क्रिय हो गया। कड़ी मेहनत से खड़ा किया गया संगठन धीरे-धीरे ध्वस्त हो गया और मिट्टी में मिल गया। बाद में अन्य अध्यक्ष भी नियुक्त किए गए, लेकिन वे भी प्रकोष्ठ को जीवंत बनाने में असफल रहे।
आज स्थिति यह है कि बिहारी समुदाय का एक नया, युवा और शिक्षित पीढ़ी तैयार हो चुकी है, जो राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने को उत्सुक है। लेकिन अयोग्य और तिकड़मी लोगों के कब्जे के कारण प्रकोष्ठ सुस्त पड़ा है। सवाल यह उठता है कि चक्रधर झा जी के उस स्वर्णिम काल को कैसे वापस लाया जाए, जब प्रकोष्ठ ने मुंबई के लगभग सत्तर प्रतिशत बिहारियों को संगठित कर लिया था और उनकी आवाज को प्रभावी बनाया था।
वर्तमान में मुंबई सहित आसपास के शहरों में नगर निकाय चुनाव चल रहे हैं। इन चुनावों में बिहारी उम्मीदवारों या बिहार प्रकोष्ठ की कोई खास दृश्यता नहीं दिखाई दे रही। कुछ जगहों पर बिहारी मूल के उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन वे बिहारी समुदाय की संगठित ताकत या धमक से अलग-थलग दिखते हैं।
अगले भाग में हम मुंबई में रहने वाले बिहारियों की वर्तमान राजनीतिक स्थिति और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।