(भाग 3) बिहारी समाज प्रवासी बनकर कब तक सहते रहेंगे अपमान आपसी मतभेद को त्यागे

 

 

“बॉम्बे का बिहारी” (भाग ३):- मुंबई सहित महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों में बसे बिहारियों की वर्तमान राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए, हमें इस श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए राज्य की सत्ता संरचना, प्रमुख राजनीतिक दलों के इतिहास और बिहारियों के योगदान पर एक विस्तृत नजर डालनी होगी। यह समझना आवश्यक है कि कैसे बिहारियों ने धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, लेकिन लंबे समय तक वे राजनीतिक रूप से हाशिए पर ही रहे। इस भाग में हम महाराष्ट्र के राजनीतिक परिदृश्य का ऐतिहासिक अवलोकन करेंगे, विशेष रूप से कांग्रेस के प्रभुत्व से लेकर शिवसेना-बीजेपी गठबंधन के उदय तक, और इसमें बिहारियों की भूमिका पर प्रकाश डालेंगे।

१ मई १९६० को महाराष्ट्र राज्य के गठन के बाद से २०१४ तक, कांग्रेस पार्टी ने राज्य की सत्ता पर लगभग निर्विवाद रूप से कब्जा जमाए रखा। कभी अकेले तो कभी सहयोगी दलों के साथ, कांग्रेस ने महाराष्ट्र की राजनीति को दशकों तक नियंत्रित किया। इस अवधि में राज्य की अर्थव्यवस्था, उद्योग और शहरी विकास पर कांग्रेस का गहरा प्रभाव पड़ा, लेकिन बीच-बीच में चुनौतियां भी आईं। उदाहरण के लिए, १९९५ में शिवसेना-भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) गठबंधन ने पहली बार कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया, लेकिन अगले चुनाव में कांग्रेस ने फिर से अपनी पकड़ मजबूत कर ली।

इस दौरान कांग्रेस के विरोध में कई राजनीतिक ताकतें उभरीं। शुरुआती तीन दशकों (यानी १९९० के आसपास तक) में वामपंथी पार्टियां, जैसे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) और सीपीआई (एम), तथा विभिन्न कामगार यूनियनें (मजदूर संघ) सक्रिय रहीं। ये दल श्रमिक अधिकारों, मजदूरों के हितों और सामाजिक न्याय पर आधारित चुनाव लड़ते थे। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर कुछ क्षेत्रीय दल भी कांग्रेस को चुनौती देते रहे। बाद के वर्षों में पुराने जनता दल का उदय हुआ, जिसमें प्रमुख नेता जैसे जॉर्ज फर्नांडिस और शरद राव शामिल थे। जनता दल ने राष्ट्रीय स्तर पर आपातकाल के विरोध में बनी लहर का फायदा उठाया और महाराष्ट्र में भी अपनी पैठ बनाने की कोशिश की।

उस समय शिवसेना, जिसकी स्थापना बाल ठाकरे ने की थी, भी राजनीतिक मैदान में मौजूद थी। हालांकि, शिवसेना मुख्य रूप से मराठी अस्मिता (मराठी गौरव) और स्थानीय लोगों के अधिकारों पर जोर देती थी। इसका एक प्रमुख मुद्दा था ‘परप्रांतीय’ (बाहरी लोगों) के खिलाफ अभियान, जिसके चलते हिंदी भाषी समुदाय (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और अन्य हिंदी पट्टी के लोग) तथा दक्षिण भारतीय प्रवासी शिवसेना से दूरी बनाए रखते थे। ये समुदाय महाराष्ट्र में एक निर्णायक वोट बैंक बन सकते थे, लेकिन शिवसेना की क्षेत्रीयवादी नीतियों ने उन्हें अलग-थलग कर दिया। परिणामस्वरूप, शिवसेना कांग्रेस को सत्ता से हटाने में लंबे समय तक असफल रही।

उस कालखंड में बिहारियों की राजनीतिक स्थिति बेहद कमजोर थी। उनके पास न तो कोई प्रमुख राजनीतिक चेहरा था, न ही वे एक संगठित वोट बैंक के रूप में उभरे। यदि कुछ प्रभाव था तो वह उत्तर भारतीय समुदाय के नाम पर था, जिसमें मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के लोग शामिल थे, और बिहारी अक्सर उनके पिछलग्गू के रूप में देखे जाते थे। मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य शहरों में बसे बिहारी मुख्य रूप से मजदूरी, छोटे व्यवसाय या सेवा क्षेत्र में लगे थे, लेकिन राजनीतिक स्तर पर उनकी आवाज दबी हुई थी। वे चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाने से वंचित रहे, क्योंकि कोई दल उन्हें विशेष रूप से लक्षित नहीं करता था।

१९९० के दशक के शुरुआत में राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया। पुराने जनता दल से अलग होकर बनी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने महाराष्ट्र में अपनी जड़ें जमाने की कोशिश की। स्वर्गीय प्रमोद महाजन, जो बीजेपी के प्रमुख रणनीतिकार थे, ने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की विचारधारा को आधार बनाकर शिवसेना के साथ गठबंधन किया। इस गठबंधन ने मुंबई और आसपास के शहरों में रहने वाले हिंदी भाषी समुदाय को आकर्षित किया। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की इस डोर ने हिंदी पट्टी के लोगों को बीजेपी के पीछे लामबंद कर दिया, जो पहले शिवसेना की क्षेत्रीयवादी नीतियों से दूर थे।

इसका नतीजा १९९५ के विधानसभा चुनाव में दिखा, जब शिवसेना-बीजेपी गठबंधन ने कांग्रेस को हराकर सत्ता हासिल की। इस जीत में हिंदी भाषी वोटरों की महत्वपूर्ण भूमिका थी, और उत्तर प्रदेश मूल के अभिराम सिंह जैसे नेता बीजेपी से विधायक चुने गए। हालांकि, इस दौरान उत्तर प्रदेश के लोगों को वोट बैंक के रूप में चिन्हित किया गया, लेकिन बिहारियों का कहीं नामोनिशान नहीं था। वे राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की छत्रछाया में बंधे तो थे, लेकिन अलग से अपनी पहचान नहीं बना पाए। १९९० के बाद बीजेपी-शिवसेना का दबदबा बढ़ा, लेकिन बिहारियों की स्थिति राजनीतिक रूप से दबी-कुचली ही रही। वे बीजेपी से जुड़े होने के बावजूद मुख्यधारा की राजनीति में हाशिए पर बने रहे।

१९९० के दशक में बिहार में लालू प्रसाद यादव के शासनकाल में व्याप्त कुशासन, बेरोजगारी और अराजकता ने बड़े पैमाने पर पलायन को जन्म दिया। लाखों बिहारी मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य शहरों में आकर बस गए, जहां वे परिवार के पालन-पोषण के साथ-साथ सामाजिक सेवा और राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश करने लगे। मुंबई में बिहारी आबादी तेजी से बढ़ी, और अब समय आ गया था कि वे खुद को संगठित करें। लेकिन सवाल उठता था: संगठन की जिम्मेदारी कौन ले? और क्यों ले? इन सवालों ने बिहारियों को लंबे समय तक दबे-कुचले रहने पर मजबूर कर दिया। कोई मजबूत नेतृत्व या प्लेटफॉर्म न होने के कारण, वे राजनीतिक रूप से असंगठित रहे।

२००३ के आसपास एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। बिहार बीजेपी के कुछ संगठन पदाधिकारी मुंबई पहुंचे और स्वर्गीय प्रमोद महाजन के समक्ष बिहारी समुदाय की व्यथा सुनाई। महाजन ने बिहारियों को एक संभावित वोट बैंक के रूप में पहचाना और उनकी पहचान को मजबूत करने के लिए बीजेपी में ‘बिहार प्रकोष्ठ’ का गठन करवाया। यह प्रकोष्ठ बिहारियों को संगठित करने, उनकी समस्याओं को उठाने और राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने का माध्यम बना। इससे बिहारियों में एक नई उम्मीद जगी, और वे धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक दशा सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाने लगे।

इस ऐतिहासिक अवलोकन से स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की राजनीति में बिहारियों की यात्रा संघर्षपूर्ण रही है। कांग्रेस के प्रभुत्व से लेकर बीजेपी-शिवसेना गठबंधन तक, वे मुख्य रूप से अदृश्य या सहायक भूमिका में रहे। लेकिन २००० के दशक में पलायन की लहर और बिहार प्रकोष्ठ के निर्माण ने उन्हें एक नई दिशा दी।

इस श्रृंखला के अगले भाग में हम वर्तमान समय में बिहार प्रकोष्ठ की स्थिति, उसके विकास और बिहारियों की राजनीतिक दशा पर गहराई से विचार करेंगे। क्या यह प्रकोष्ठ बिहारियों को मुख्यधारा की राजनीति में मजबूत स्थान दिला पाया है? या अभी भी चुनौतियां बाकी हैं? इन सवालों का जवाब अगले भाग में।

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