
“बॉम्बे का बिहारी” (भाग २) :- महाराष्ट्र में मुंबई सहित उसके आसपास के शहरों में बसे बिहारियों की वर्तमान राजनीतिक दशा एवं दिशा को समझने वाली इस श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए, हम सबसे पहले उनके ऐतिहासिक योगदान पर नजर डालेंगे। इससे पहले कि हम उनकी राजनीतिक यात्रा के इतिहास में उतरें, आइए उस गौरवशाली योगदान की चर्चा करें, जिसमें बिहार से आए मजदूर, व्यापारी, छात्र, सरकारी प्रशासनिक अधिकारी और यहां तक कि ऋषि-मुनियों ने महाराष्ट्र की इस तपोभूमि को मजबूत बनाया है।
महाराष्ट्र, जिसे शारीरिक एवं मानसिक श्रम से लक्ष्यों को सरलता से प्राप्त करने वाली भूमि के रूप में जाना जाता है, की अर्थव्यवस्था और संस्कृति में बिहारियों का योगदान सदियों पुराना है। ये प्रवासी न केवल श्रमशक्ति के रूप में आए, बल्कि उन्होंने यहां की सामाजिक संरचना को भी समृद्ध किया, हालांकि इसके बदले में उन्हें अक्सर पूर्वाग्रह और अपमान का सामना करना पड़ा।
पौराणिक इतिहास से शुरू करें तो, शिव पुराण और अन्य ग्रंथों में महाराष्ट्र की पवित्र भूमि पर बिहार से जुड़े व्यक्तियों के योगदान का उल्लेख मिलता है। उदाहरण के लिए, ऋषि गौतम का महत्वपूर्ण स्थान है जो प्राचीन बिहार (मिथिला) क्षेत्र से जोड़ा जाता है। गौतम ऋषि, जिन्होंने नासिक के आसपास के क्षेत्रों में पानी के बिना व्याकुल जीवन को बचाने के लिए अपनी तपस्या के बल पर पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध करवाया। लेकिन उन्हें भी परप्रांतीय होने के कारण अपमानित किया गया। बाद में उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न कर त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना किया और गोदावरी नदी (जिसे दक्षिण की गंगा कहा जाता है) को महाराष्ट्र की भूमि पर अवतरित करवाया।
इस घटना ने न केवल महाराष्ट्र की आध्यात्मिक विरासत को मजबूत किया, बल्कि जल संसाधनों के माध्यम से समाज कल्याण को भी बढ़ावा दिया। लेकिन स्थानीय समाज द्वारा ऋषि गौतम को प्रारंभ में अपमानित एवं अस्वीकार किया गया था।
यह पौराणिक उदाहरण दर्शाता है कि बिहारियों का योगदान प्राचीन काल से ही महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नींव को मजबूत करने में रहा है, लेकिन साथ ही सामाजिक पूर्वाग्रहों की छाया भी उस पर पड़ी है।
स्वतंत्रता संग्राम के दौर में बिहारियों का योगदान और भी उल्लेखनीय रहा। बिहार से आए लोगों ने महाराष्ट्र की भूमि पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष में अपनी जान की आहुति दी। १८५७ की क्रांति में बिहारी सैनिकों की भूमिका प्रमुख थी, जहां उन्होंने विद्रोह में सक्रिय भाग लिया।
बाद में, चंपारण आंदोलन से प्रेरित होकर मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य शहरों में बसे बिहारियों ने गांधीजी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी। क्विट इंडिया मूवमेंट (१९४२) में बिहार का योगदान तो जगजाहिर है, जहां स्थानीय नेता जैसे जयप्रकाश नारायण और अन्य ने पूरे देश को प्रभावित किया, और मुंबई में बसे बिहारी मजदूरों ने हड़तालों और प्रदर्शनों के माध्यम से इसका समर्थन किया।
इन आंदोलनों में बिहारियों ने न केवल श्रम प्रदान किया, बल्कि बौद्धिक और संगठनात्मक स्तर पर भी योगदान दिया, जिससे महाराष्ट्र की स्वतंत्रता की लड़ाई मजबूत हुई। इतना ही नहीं, मुंबई के मिल मजदूरों में बिहारी प्रवासियों की बड़ी संख्या थी, जो कम्युनिस्ट और राष्ट्रवादी आंदोलनों में सक्रिय रहे।
स्वतंत्र भारत में भी, बिहारियों का योगदान जारी रहा। मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य शहरों जैसे ठाणे, नवी मुंबई और पुणे में बसे लाखों बिहारी प्रवासी आज भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। वे निर्माण, उद्योग, व्यापार, परिवहन और सेवा क्षेत्र में कार्यरत हैं, जिससे महाराष्ट्र की जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान होता है।
सरकारी सेवाओं में—जैसे आईएएस, आईपीएस, बैंकिंग और रेलवे—बिहारियों की संख्या उल्लेखनीय है, जो राष्ट्रीय एकीकरण को मजबूत करती है।
सांस्कृतिक रूप से, उन्होंने भोजपुरी सिनेमा, लोक संगीत और त्योहारों के माध्यम से महाराष्ट्र की बहुसांस्कृतिकता को समृद्ध किया है। बिहारी व्यापारी मुंबई के बाजारों में सक्रिय हैं, जबकि छात्र विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर यहां की शिक्षा प्रणाली को विविधता प्रदान करते हैं। इन योगदानों से महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था न केवल मजबूत हुई है, बल्कि यह राज्य भारत की आर्थिक राजधानी के रूप में उभरा है।
बावजूद इन सबके, बिहारियों को अक्सर सामाजिक अपमान और हाशिए पर ढकेलने का सामना करना पड़ता है। मुंबई जैसे शहरों में ‘बिहारी’ शब्द को कभी-कभी नकारात्मक अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है, जो प्रवासियों के प्रति पूर्वाग्रह को दर्शाता है।
राजनीतिक रूप से, उन्हें ‘बाहरी’ मानकर वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन उनके अधिकारों की रक्षा कम होती है। यह विडंबना है कि पौराणिक काल से लेकर आधुनिक समय तक बिहारियों ने महाराष्ट्र को इतना दिया है, फिर भी वे सामाजिक सम्मान और समावेश से वंचित रह जाते हैं।
मुंबई और महाराष्ट्र में चिरकाल से इतिहास होने के बावजूद, बिहारी समुदाय अपने राजनीतिक वजूद को स्थापित क्यों नहीं कर पा रहा है? इस सवाल की गहराई को समझने के लिए, इस श्रृंखला के अगले भाग में हम उनकी राजनीतिक यात्रा के इतिहास पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जहां संगठनात्मक कमजोरियां, स्थानीय राजनीति और प्रवासी चुनौतियां जैसे पहलुओं को छुआ जाएगा।
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