
पटना
बिहार चुनाव २०२५
बिहार विधानसभा चुनाव २०२५ के लिए मतदान और मतगणना की तारीखों की घोषणा हो चुकी है। अब बिहार के मतदाताओं के सामने एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है—अपने मत के माध्यम से ऐसी सरकार चुनना जो प्रदेश के हित में कार्य करे।
इस बीच, विभिन्न राजनीतिक दल और उनके उम्मीदवार अपने वादों और इरादों के साथ जनता के बीच जाएंगे, मतदाताओं से मिलेंगे और उनकी मांगों को सुनेंगे। यह समय बिहार के मतदाताओं के लिए एक सुनहरा अवसर है कि वे न केवल अपनी बुनियादी आवश्यकताओं जैसे सड़क, बिजली, पानी, रोजगार आदि की मांग करें, बल्कि प्रदेश की आत्मा, संस्कृति और भविष्य को संवारने वाली मांगों को भी उठाएं।
बिहार की सबसे बड़ी पूंजी है उसकी प्रतिभा है। बिहार की मिट्टी और पानी में वह जादू है, जो यहाँ जन्मे और पले-बढ़े लोगों को असाधारण बुद्धि, प्रतिभा और क्षमता प्रदान करता है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि इतिहास और वर्तमान का सत्य है। बिहार के नौजवानों ने हर क्षेत्र—चाहे वह शिक्षा हो, प्रशासन हो, विज्ञान हो, साहित्य हो या कोई अन्य क्षेत्र—में अपनी प्रखर प्रतिभा का लोहा मनवाया है। देश और दुनिया ने बिहार की इस प्रतिभा को हमेशा सराहा है।
लेकिन यह दुखद सत्य है कि स्वार्थी और संकीर्ण सोच वाले नेताओं ने इस प्रतिभा को नजरअंदाज किया है। व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थों के चलते बिहार की इस अनमोल संपदा को सही दिशा और अवसर प्रदान करने के बजाय, उसे दिशाहीन और उपेक्षित छोड़ दिया गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि बिहार की प्रतिभा अपनी जड़ों—अपनी संस्कृति, नैतिकता और मानवीय मूल्यों—से कटती जा रही है। यह कटाव न केवल बिहार की बदहाली का एक बड़ा कारण है, बल्कि प्रदेश की बदनामी का भी एक प्रमुख कारक है।
बिहार के मतदाताओं से कि इस विधानसभा चुनाव में वे अपने उम्मीदवारों से एक ऐसी मांग करें, जो न केवल बिहार की प्रतिभा को सही दिशा दे, बल्कि प्रदेश को नैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भी समृद्ध बनाए। यह मांग है—श्रीमद्भगवद्गीता और श्री रामचरितमानस को बिहार के शैक्षणिक संस्थानों (सरकारी और गैर-सरकारी) में पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।
प्रदेश के प्रतिभा को पूर्ण परिचालन के लिए इन दोनों ग्रंथों को आठवीं कक्षा से ही आंशिक रूप से पढ़ाना शुरू किया जाए, चाहे वह अनिवार्य हो या स्वैच्छिक। इन ग्रंथों का अध्ययन बिहार के युवाओं को न केवल नैतिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत करेगा, बल्कि उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए प्रेरित भी करेगा।
श्रीमद्भगवद्गीता और श्री रामचरितमानस भारतीय संस्कृति के दो अमूल्य रत्न हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश जीवन के हर पहलू—कर्तव्य, धर्म, नैतिकता, और आत्मसंयम—का मार्गदर्शन करता है। यह ग्रंथ न केवल आध्यात्मिक ज्ञान देता है, बल्कि व्यक्ति को जीवन की चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा भी देता है।
दूसरी ओर, श्री रामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित एक ऐसा महाकाव्य है, जो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन के माध्यम से आदर्श जीवन, नैतिकता, और सामाजिक मूल्यों को प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ सहज और सरल भाषा में गहन जीवन दर्शन को प्रस्तुत करता है, जो हर वर्ग और आयु के व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है।
गीता और रामचरितमानस में ऐसी शिक्षाएं हैं जो जातिवाद, क्षेत्रवाद और धार्मिक उन्माद जैसे सामाजिक जहर को खत्म करती हैं। ये ग्रंथ व्यक्ति को मानवता, करुणा, और समानता का पाठ पढ़ाते हैं। जब बिहार का युवा इन ग्रंथों का अध्ययन करेगा, तो उसका दृष्टिकोण व्यापक और समावेशी होगा। वह न केवल अपने लिए, बल्कि समाज और देश के लिए भी सकारात्मक योगदान देगा।
बिहार की प्रतिभा को यदि सही दिशा और संस्कार मिले, तो वह विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ सकती है। गीता और रामचरितमानस का अध्ययन न केवल बौद्धिक विकास को बढ़ावा देगा, बल्कि युवाओं में आत्मविश्वास, धैर्य, और नेतृत्व की क्षमता भी विकसित करेगा। यह शिक्षा उन्हें न केवल तकनीकी और व्यावसायिक रूप से सक्षम बनाएगी, बल्कि एक बेहतर इंसान बनने में भी मदद करेगी।
कुछ लोग इस मांग का विरोध कर सकते हैं। वे तर्क दे सकते हैं कि अन्य धर्मों के ग्रंथों को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। यह एक तुष्टिकरण की नीति हो सकती है, जिसका उद्देश्य मुख्य मुद्दे को भटकाना हो। श्रीमद्भगवद्गीता और श्री रामचरितमानस का कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि ये ग्रंथ भारतीय संस्कृति, नैतिकता और मानवता के सार्वभौमिक मूल्यों का प्रतीक हैं। इन ग्रंथों में ऐसी शिक्षाएं हैं जो किसी भी धर्म, जाति या समुदाय से परे हैं। ये ग्रंथ केवल हिंदुओं के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवजाति के लिए प्रासंगिक हैं।
बिहार के मतदाता इस चुनाव में अपने उम्मीदवारों से यह मांग करें कि वे सत्ता में आने पर शिक्षा प्रणाली में श्रीमद्भगवद्गीता और श्री रामचरितमानस को शामिल करें। यह मांग न केवल बिहार की शिक्षा व्यवस्था को समृद्ध करेगी, बल्कि प्रदेश की नई पीढ़ी को नैतिकता, संस्कृति और मानवता के पथ पर ले जाएगी।
जब बिहार का युवा इन ग्रंथों के ज्ञान से लैस होकर देश और दुनिया में कदम रखेगा, तो वह न केवल अपनी प्रतिभा से सबको प्रभावित करेगा, बल्कि अपने नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों से भी सबके सामने एक आदर्श प्रस्तुत करेगा। ऐसा युवा न तो जातिवाद में फंसेगा, न ही क्षेत्रवाद के जहर से प्रभावित होगा। उसका मन और मस्तिष्क स्वच्छ और सकारात्मक होगा, जो स्वयं, समाज और प्रदेश को श्रेष्ठता की ओर ले जाएगा।
आइए, इस बार के विधानसभा चुनाव में बिहार के मतदाता एक नई शुरुआत करें। अपने मतपात्रों( उम्मीदवार)से यह मांग करें कि वे बिहार की शिक्षा व्यवस्था में श्रीमद्भगवद्गीता और श्री रामचरितमानस को शामिल करें। यह मांग बिहार के उज्ज्वल भविष्य की नींव रखेगी। बिहार की प्रतिभा को उसकी जड़ों से जोड़कर, हम एक समृद्ध, संस्कारित और सशक्त बिहार का निर्माण कर सकते हैं।
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