
इन दिनों समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र बिंदु बने हुए हैं। यह चर्चा उनके द्वारा किसी समाज या राष्ट्रहित के कार्य के लिए नहीं, बल्कि एक विशेष जाति के प्रति की गई अत्यंत अभद्र, अमर्यादित और घृणित टिप्पणी के कारण हो रही है।
मई माह के प्रथम सप्ताह में दिल्ली स्थित जवाहर भवन में डॉ. रफरफ शकील अंसारी एवं जावेद अनवर द्वारा लिखित तथा राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘जाति और सांप्रदायिकता के विषाणु’ का लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया।

‘पसमांदा मुस्लिम महज़’ नामक संस्था द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में प्रमुख वक्ताओं के रूप में योगेन्द्र यादव, अभय कुमार दुबे, आशुतोष तथा राजकुमार भाटी जैसे जाति और सांप्रदायिकता के विषाणु पोषक विचारकों को आमंत्रित किया गया था।
इसी कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने अपने संबोधन के दौरान ब्राह्मणों के बारे में इतनी अभद्र और अमर्यादित टिप्पणी की कि उसे दोहराना भी उचित नहीं समझा जाता।
यह राजकुमार भाटी का कोई पहला अवसर नहीं है, न ही उनका यह आक्रामक रवैया किसी एक जाति विशेष तक सीमित है। वे नियमित रूप से हिंदू समाज, हिंदू धर्माचार्यों, हिंदू देवी-देवताओं तथा हिंदू धर्मग्रंथों के विरुद्ध अशोभनीय, अनर्गल और घृणित बयानबाजी करते रहते हैं।
कुछ पत्रकारों और स्वघोषित बुद्धजीवियों द्वारा राजकुमार भाटी को “विद्वान” की श्रेणी में रखा जा रहा है, परंतु उनके व्यक्तव्यों को देखते हुए स्पष्ट हो जाता है कि वे न केवल स्वयं मूर्ख हैं, बल्कि मूर्खों के ब्रांड एम्बेसडर भी हैं। पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नाम पर अखिलेश यादव की तुष्टिकरण और जातिवादी राजनीति के पोषक से अधिक कुछ अपेक्षा करना ही व्यर्थ है। किसी पुस्तक के लोकार्पण समारोह के अवसर पर भाटी ने विद्वान प्रवक्ता की भूमिका निभाने के बजाय अपनी पार्टी लाइन का पालन करते हुए जो कुछ कहा, उसमें दुर्गंध आना स्वाभाविक ही था।
इन मूर्ख ‘मानसिक सूरदास’ जैसे लोगों को मार्गदर्शक मान लेने के कारण समाजवादी पार्टी तेज गति से गर्त की ओर जा रही है। राजकुमार भाटी जैसे लोग हिंदुस्तान की आत्मा को समझने में पूरी तरह असफल साबित हो रहे हैं। अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ साधने के लिए वे विपक्षी दलों पर प्रहार करने के बजाय सीधे हिंदुस्तानी आत्मा पर प्रहार कर रहे हैं।
हिंदू और हिंदुत्व भारत की आत्मा है। इस मानसिक सूरदास मूर्खाधिराज को यह सत्य दिखाई नहीं दे रहा है कि इसी प्रकार की हिंदू-विरोधी और तुष्टिकरण वाली बयानबाजी के कारण समाजवादी पार्टी व अन्य राजनीतिक पार्टियां लगातार सिमटती जा रही है और जनता से कटती जा रही है।
उत्तर प्रदेश सरकार से निवेदन है कि इस ‘मानसिक सूरदास’ का सरकारी अस्पताल में उचित इलाज करवाए, अन्यथा सबल विपक्ष होने का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी इस मूर्खाधिराज के मार्गदर्शन में कुएं में गिरने की प्रबल संभावना से ग्रस्त हो जाएगी।
तीसरी आंख
सपा के तथाकथित विद्वान प्रवक्ता राजकुमार भाटी की अशिष्ट और अमर्यादित टिप्पणी देखकर एक बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि वे कभी किसी ‘ब्राह्मण टोली’—अर्थात् ब्राह्मणों के समुदाय—में गये ही नहीं हैं। भाटी की बातचीत और दृष्टिकोण से यही लगता है कि ब्राह्मण समाज के बारे में उनकी समझ बेहद सीमित और पूर्वाग्रहों से भरी हुई है।
हाँ, शायद पास बैठे कांग्रेस प्रवक्ता अभय दूबे, राजद प्रवक्ता मनोज झा एवं मृत्युंजय तिवारी जैसे ‘ब्राम्हण’ को देखकर उन्होंने एक सामुदायिक छवि बना ली होगी। इनके उपनामों और व्यक्तित्व को देखते हुए उन्हें लगा होगा कि यही ब्राह्मण समाज का प्रतिनिधित्व है। इसी संकीर्ण अवधारणा के आधार पर किसी ‘कलमुहे’ कवि द्वारा लिखी गई कविता भी उन्हें ब्राह्मणों पर सटीक और उचित प्रतीत हो गई।
संक्षेप में कहें तो—जिस व्यक्ति ने ब्राह्मण समाज को करीब से कभी देखा ही नहीं, उसकी टिप्पणियाँ कितनी हास्यास्पद, पूर्वाग्रही और अशोभनीय हो सकती हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण राजकुमार भाटी की यह अमर्यादित टिप्पणी है। वास्तविक ब्राह्मण समाज की विविधता, विद्वता, परंपराओं और मूल्यों को समझे बिना केवल कुछ चेहरे देखकर सामान्यीकरण करना न सिर्फ गलत है, बल्कि बेहद संकीर्ण सोच को दर्शाता है।