
देश के पाँच राज्यों — पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी — में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम आने में अब मात्र कुछ घंटे शेष हैं। मतगणना के बाद स्पष्ट हो जाएगा कि इन राज्यों में किसकी सरकार बनेगी।
अनुभवी राजनीतिक विश्लेषक और भविष्यवक्ता अन्य चार राज्यों में सरकार किसकी बनने वाली है, इसकी अनुमानित तस्वीर पहले ही बता चुके हैं। परंतु पश्चिम बंगाल को लेकर वे चुप हैं। इस चुप्पी के पीछे कोई साधारण द्वंद्व नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की जटिल और संवेदनशील राजनीतिक-जनसांख्यिकीय वास्तविकता छिपी हुई है।
पश्चिम बंगाल भारत का पूर्वी सीमावर्ती राज्य है जो बांग्लादेश से सटा हुआ है। भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, यहाँ लगभग सवा दो हजार किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा नदियों, घने जंगलों और मैदानी इलाकों से होकर गुजरती है। इसमें से करीब डेढ सौ किलोमीटर पर बाड़बंदी का कार्य पूरा हो चुका है, लेकिन शेष हिस्सों में अभी भी सुरक्षा चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

स्वतंत्रता के बाद से ही भौगोलिक विषमताओं, प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का फायदा उठाकर बांग्लादेशी घुसपैठिए बड़ी संख्या में पश्चिम बंगाल में आकर बसते गए हैं। समय के साथ इन घुसपैठियों ने न केवल राज्य के संसाधनों पर कब्जा जमाया, बल्कि स्थानीय राजनीति में भी गहरा प्रभाव स्थापित कर लिया। इस प्रक्रिया में राज्य के कुछ तत्वों ने भी उनका साथ दिया।
आज पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकी काफी हद तक बदल चुकी है। वोट बैंक की राजनीति करने वाले दल राष्ट्रीय हित को ताक पर रखकर वोटों की गिनती करते हैं। भारी तादाद वाले इस वोट बैंक को देखते हुए सरकारें भी इनके अनुकूल नीतियाँ अपनाती रही हैं। सरकारी योजनाओं, सुविधाओं और संरक्षण का पूरा लाभ इन समूहों को मिलता रहा।
नतीजतन, राज्य विकास के पैमाने पर पिछड़ा, हिंदू उत्पीड़न, अराजकता, महिलाओं पर अत्याचार, साम्प्रदायिक हिंसा और लक्षित हत्याएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। पिछले एक दशक से ममता बनर्जी की सरकार भी खुलकर वोट बैंक की राजनीति में लगी हुई है। आम जनता इस सत्तानीति से त्रस्त हो चुकी है, लेकिन खुलकर बोलने से कतराती है। चुनाव के दौरान सत्ताधारी पक्ष के कार्यकर्ता विपक्षी उम्मीदवारों और उनके समर्थकों को डराने-धमकाने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं।
इसी आतंक और भय के माहौल के कारण सर्वेक्षण एजेंसियाँ और राजनीतिक विश्लेषक भी पश्चिम बंगाल के चुनावी परिणाम को लेकर स्पष्ट भविष्यवाणी करने से बच रहे हैं। आम मतदाता मुंह खोलने में डर रहा है।
सरकार किसी की भी बने लेकिन यह स्थिति केवल पश्चिम बंगाल की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए गंभीर खतरा है। बांग्लादेशी घुसपैठिए सिर्फ आर्थिक संसाधनों का दोहन ही नहीं कर रहे, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द और सीमा अखंडता के लिए भी चुनौती बन चुके हैं।