ऋषि मुनि देवता कृषक और जवान की ना करें जनप्रतिनिधि अपमान ।।

संत शिरोमणि तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस एक ऐसा अमर ग्रंथ है, जिसमें भगवान श्रीराम की कथा को अत्यंत भावपूर्ण और आध्यात्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इस महाकाव्य में तुलसीदास जी ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि यह राम कथा तीर्थराज प्रयाग (वर्तमान प्रयागराज) में याज्ञवल्क्य ऋषि द्वारा भारद्वाज मुनि को सुनाई गई थी। भारद्वाज मुनि, जो प्रयाग में ही निवास करते थे, इस पवित्र कथा के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं।
तुलसीदास जी ने प्रयागराज का वर्णन करते हुए इसे एक ऐसे तीर्थ के रूप में चित्रित किया है, जहां आध्यात्मिकता और भक्ति का संगम होता है। विशेष रूप से, वे बताते हैं कि माघ मास में जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब कल्पवास के लिए ऋषि-मुनि, देवता, दैत्य, नर तथा किन्नर आदि विविध समाज के लोग वहां एकत्रित होते हैं। यह समागम उत्साह और श्रद्धा से भरा होता है, जहां सभी त्रिवेणी संगम में स्नान करते हुए भगवान माधव (श्रीविष्णु) के चरणों की पूजा-अर्चना करते हैं।
इस पवित्र स्थल पर ऋषि-मुनि न केवल स्नान और पूजा तक सीमित रहते हैं, बल्कि त्रिवेणी के तट पर ब्रह्म निरूपण, धर्म के विधान तथा ज्ञान-वैराग्य से युक्त भगवान की भक्ति पर गहन चर्चा करते हैं। यह आध्यात्मिक चिंतन और विमर्श न केवल व्यक्तिगत उत्थान का माध्यम बनता है, बल्कि पूरे देश की दशा और दिशा को सकारात्मक दिशा प्रदान करता है। ऐसे में प्रयागराज का महत्व केवल एक तीर्थ के रूप में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में उभरता है, जहां भक्ति, ज्ञान और सद्भाव का मिलन होता है। तुलसीदास जी का यह वर्णन हमें याद दिलाता है कि प्रयाग जैसे तीर्थ स्थल आस्था के प्रतीक हैं, जो समाज को एकजुट कर सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं।
किंतु, विडंबना यह है कि आजकल की मीडिया द्वारा त्रिवेणी संगम तीर्थराज प्रयाग से जो खबरें प्रसारित की जा रही हैं, वे पूरी तरह से नकारात्मक हैं। इन खबरों में आध्यात्मिक चिंतन, भक्ति और सकारात्मक विमर्श की बजाय संतों और शासन के बीच टकराव को प्रमुखता दी जा रही है। इस टकराव में पूर्वाग्रह, दुराग्रह, अतिवादिता तथा हठधर्मिता जैसे तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, जो तीर्थ की पवित्रता और उद्देश्य को धूमिल कर रहे हैं। ऐसे में, प्रयाग की छवि एक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में कम, और विवादों के अखाड़े के रूप में अधिक उभर रही है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। तिसपर राजनीतिक दलों खासकर विपक्षियों द्वारा अपना-अपना रोटी सेंकने वाला बयानबाजी से कल्पवास जैसे महत्वपूर्ण सनातनी आध्यात्मिक परंपराओं का मान मर्दन किया जा रहा है।
इस संदर्भ में, उत्तराखंड स्थित ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे शुरू(पद ग्रहण) से ही विवादास्पद रहे हैं। शंकराचार्य जैसे गरिमामय पद पर आसीन होने के बावजूद, उन्होंने पिछले कुंभ मेला, श्रीराम मंदिर निर्माण तथा विग्रह स्थापना के अवसरों पर विवादित बयान दिए हैं, जो उनके खाते में दर्ज हैं। इतना ही नहीं, उनके विवादों का संबंध पिछली समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार से भी जुड़ा रहा है, जहां राजनीतिक हितों के कारण विवादों को हवा दी गई। वास्तव में, अविमुक्तेश्वरानंद जी अपने को सर्वोच्च सिद्ध करने की होड़ में अपने पद की मर्यादा को तिलांजलि दे चुके हैं और एक ‘बबाली बाबा’ की छवि में परिवर्तित हो गए हैं। उनके वक्तव्य और व्यवहार की आलोचना अब संत समाज द्वारा भी खुलकर की जा रही है, जो दर्शाता है कि उनके कृत्य संत परंपरा की गरिमा से मेल नहीं खाते। ऐसे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के कारण तीर्थ की पवित्रता प्रभावित होना चिंताजनक है।
इस स्थिति में उत्तर प्रदेश सरकार को चाहिए कि संतों का सम्मान बनाए रखते हुए इस संवेदनशील मामले को संघर्ष के बजाय मर्यादित और संयमित ढंग से निपटाए। संत समाज भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है, इसलिए किसी भी विवाद को राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव से नहीं, बल्कि संवाद और समझदारी से हल किया जाना चाहिए। साथ ही, मीडिया को भी अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करना चाहिए। इसे ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य और गोरखनाथ मठ के महंत, शासन या संत समाज के बीच का व्यक्तिगत विवाद बनाकर आम जनता के समक्ष परोसने से बचना चाहिए। मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सनसनीखेज खबरों की बजाय सच्चाई और सकारात्मकता को प्राथमिकता दे।
इसके बजाय, सरकार के शासन-प्रशासन को त्रिवेणी संगम में कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। वहां आने वाले लाखों भक्तों के लिए बेहतर व्यवस्था, जैसे स्वच्छता, सुरक्षा, आवागमन की सुविधा, चिकित्सा सेवाएं तथा अन्य आवश्यक सुविधाएं सुनिश्चित करना प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी प्रकार, मीडिया को इन बेबुनियाद झगड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की बजाय प्रयाग की श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण को उजागर करना चाहिए। इससे न केवल तीर्थ की सच्ची छवि सामने आएगी, बल्कि समाज में सकारात्मक संदेश भी प्रसारित होगा।
विपक्षी नेताओं को चाहिए कि इसका राजनीतिकरण करने के बजाय इस मामले को सलटाने का सकारात्मक सहयोग करें।
अंततः, हमें तुलसीदास जी के वर्णन से प्रेरणा लेनी चाहिए और प्रयाग जैसे तीर्थों को विवादों से मुक्त रखकर उनकी आध्यात्मिक गरिमा को बनाए रखना चाहिए। इससे देश की सांस्कृतिक विरासत मजबूत होगी और समाज में सद्भाव का विस्तार होगा।
आइए, हम सब मिलकर प्रयाग की पवित्रता को बनाए रखें। विवादों से ऊपर उठकर भक्ति और सद्भाव का संदेश फैलाएं।
जय श्रीराम! जय गंगा मइया! 🌸🙏

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