
श्री रामचरितमानस में भगवान श्रीराम के आदर्श राज्य, रामराज्य की परिकल्पना को चित्रित करते हुए तुलसीदास जी ने कहा है: “अल्पमृत्यु नहिं कवनिऊ पीरा”। इसका अर्थ है कि रामराज्य में न तो किसी की छोटी अवस्था में मृत्यु होती है और न ही किसी को कोई पीड़ा सहनी पड़ती है। यहां ‘अल्पमृत्यु’ या ‘छोटी अवस्था में मृत्यु’ को अकालमृत्यु के रूप में भी समझा जा सकता है, जहां असमय मौत से बचाव सुनिश्चित होता है और समाज में शांति, स्वास्थ्य तथा सुरक्षा का वातावरण व्याप्त रहता है। रामराज्य की यह अवधारणा एक ऐसे शासन की कल्पना करती है जहां प्रजा का जीवन सुरक्षित, दुखरहित और दीर्घायु हो, तथा राज्य की जिम्मेदारी होती है कि वह हर संभव प्रयास से नागरिकों की रक्षा करे।
रामराज्य जैसी आदर्श व्यवस्था का दावा करके सत्ता में आने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बिहार में इस प्रकार की व्यवस्था स्थापित करने में विफल साबित हो रही है, विशेष रूप से अकालमृत्यु को रोकने के संदर्भ में। पार्टी ने चुनावी वादों और प्रचार में रामराज्य की भावना को बार-बार उजागर किया है, जहां न्याय, समानता और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन वास्तविकता में, बिहार की सड़कें मौत का पर्याय बन चुकी हैं, और सरकारी तंत्र इस समस्या पर नियंत्रण पाने में असमर्थ दिखाई देता है। यहां तक कि आपराधिक घटनाओं, प्राकृतिक आपदाओं या बिजली-पानी से जुड़ी दुर्घटनाओं को अलग रखकर देखें, तो भी सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या किसी महामारी से कम नहीं है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, बिहार में सड़क दुर्घटनाओं से औसतन प्रतिदिन ३० से ३५ लोगों की मौत हुई है, जो वर्षों से चली आ रही इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।
इन अकालमृत्यों का प्रभाव केवल सांख्यिकी तक सीमित नहीं है; यह परिवारों और समाज पर गहरा भावनात्मक और सामाजिक आघात पहुंचाता है। किसी व्यक्ति की असमय मौत के बाद उसके परिजनों को जो पीड़ा होती है, वह हृदय को विदीर्ण कर देती है। एक दुर्घटना में पिता, पति या पुत्र की मौत से परिवार में विधवाएं, अनाथ बच्चे और बेसहारा बुजुर्ग उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, एक युवा कमाने वाले की मौत से घर की आर्थिक स्थिति डगमगा जाती है, बच्चे शिक्षा से वंचित हो सकते हैं, और महिलाएं सामाजिक असुरक्षा का शिकार बनती हैं। समाज में ऐसी घटनाएं बढ़ने से सामूहिक भय और असंतोष का वातावरण बनता है, जो विकास की राह में बाधा डालता है। ये मौतें न केवल व्यक्तिगत दुख हैं, बल्कि राज्य की विफलता का प्रमाण भी हैं, क्योंकि अधिकांश दुर्घटनाएं लापरवाही, खराब सड़कें, यातायात नियमों का उल्लंघन और अपर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं से जुड़ी होती हैं।
इस समस्या को दूर करने की जिम्मेदारी पूर्णतः सरकार पर है, और इसे सरकारी प्रयासों से काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। उदाहरणस्वरूप, सड़कों की गुणवत्ता सुधारना, यातायात नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना, चालकों की ट्रेनिंग, स्पीड ब्रेकर और साइन बोर्ड लगाना, साथ ही दुर्घटना के बाद त्वरित चिकित्सा पहुंच जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
प्रशासनिक सुझबूझ और सक्रियता से इन मौतों की संख्या को न्यूनतम स्तर पर लाया जा सकता है, जैसा कि अन्य राज्यों में सफल उदाहरण देखे गए हैं। लेकिन बिहार सरकार इस दिशा में पर्याप्त इच्छाशक्ति और प्रयास दिखाने में असफल रही है। अधिकतर मामलों में, सरकार केवल मुआवजे की घोषणा तक सीमित रह जाती है, जो जमीन पर प्रभावी रूप से लागू नहीं होती।
हाल ही में सरकार द्वारा अतिक्रमण हटाने के लिए बुल्डोजर अभियान चलाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य सड़कों को चौड़ा करना, ट्रैफिक जाम कम करना और यातायात को सुगम बनाना है। यह कदम सराहनीय है, क्योंकि अतिक्रमण से सड़कें संकरी हो जाती हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है। लेकिन इससे पहले कि सरकार ट्रैफिक जाम से बचाने के लिए बुल्डोजर चलाए, उसे नागरिकों की जान बचाने के अधिक व्यापक और तात्कालिक प्रयास करने चाहिए। सड़क सुरक्षा के लिए इंजीनियरिंग सुधार, ब्लैक स्पॉट्स की पहचान और सुधार, ओवरस्पीडिंग पर नियंत्रण, हेलमेट और सीट बेल्ट के अनिवार्य उपयोग की सख्ती, तथा आपातकालीन सेवाओं का विस्तार जैसे कदम प्राथमिकता पर होने चाहिए। अतिक्रमण हटाना एक हिस्सा है, लेकिन जान बचाना इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यदि बुल्डोजर केवल जाम हटाने के लिए चल रहे हैं, जबकि जान लेने वाली दुर्घटनाएं जारी हैं, तो यह प्राथमिकताओं का उलटा क्रम लगता है।
ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीतिक प्राथमिकताएं अन्य मुद्दों पर केंद्रित हैं, जबकि सड़क सुरक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्र उपेक्षित हैं। परिणामस्वरूप, रामराज्य का दावा खोखला साबित हो रहा है, क्योंकि जहां रामराज्य में प्रजा की सुरक्षा सर्वोपरि थी, वहां आज नागरिकों की जान जोखिम में है।
रामराज्य की परिकल्पना का दावा करने वाली भाजपा, जो बिहार में सत्ता पर काबिज है, को इस अकालमृत्यु की समस्या पर गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है। नीतिगत बदलाव, बजट आवंटन और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन से ही इस स्थिति को सुधारा जा सकता है। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो रामराज्य का आदर्श मात्र चुनावी नारा बनकर रह जाएगा, और जनता का विश्वास टूटेगा। अंततः, एक सच्चे रामराज्य की स्थापना के लिए, सरकार को न केवल वादे करने चाहिए, बल्कि उन्हें अमल में लाकर दिखाना चाहिए, ताकि बिहार की सड़कें जीवन का माध्यम बनें, न कि मौत का।
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