
बिहार की नई सरकार ने तो कमाल कर दिया! विधानमंडल का पहला शीतकालीन सत्र सिर्फ पांच दिनों का – जैसे कोई फाइव-स्टार होटल में वीकेंड गेटअवे हो। न सरकार को ज्यादा बोलने का मौका, न विपक्ष को ज्यादा चिल्लाने का। लेकिन तीसरे दिन ही सदन में एक बड़ा ड्रामा! नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव जी गायब! हाँ, वो तेजस्वी, जो हमेशा कैमरों के सामने “जनता की आवाज” बनकर गूंजते रहते हैं, आज सदन से फरार। सदन के अन्य सदस्य तो उन्हें “गैरजिम्मेदार” का तमगा दे रहे हैं, और क्यों न दें? आखिर सदन चल रहा है, और नेता प्रतिपक्ष कहीं “व्यस्त” हैं। अब सवाल ये कि व्यस्त किसमें?
अरे, अटकलें तो लगनी ही थीं न! राजनीति में जहां सवाल हो, वहाँ अफवाहों का बाजार गर्म हो जाता है। एक अफवाह ये उड़ रही है कि तेजस्वी जी और मुकेश सहनी जी (वही वीआईपी वाले) किसी एकांत कोने में बैठे हैं – शायद किसी लग्जरी रिसॉर्ट में, या हो सकता है किसी पुराने किले के गुप्त कक्ष में – और चुनावी “खर्चों” का हिसाब-किताब कर रहे हैं। ध्यान रहे, ये वो हिसाब नहीं जो चुनाव आयोग को दिखाया जाता है, वो तो सिर्फ कागजी खानापूर्ति है। असली वाला, जो “अंदर की बात” है!
दोनों महानुभाव टेबल पर फैली फाइलें, कैलकुलेटर, और शायद एक-दो “गुप्त” लेजर बुक लेकर बैठे हैं। पहले तो टिकटों की “बिक्री” का हिसाब – कितने टिकट बेचे गए? उससे कितने करोड़ आए? फिर चुनाव में कितना खर्च हुआ – पोस्टर, रैलियां, “समर्थकों” को “प्रोत्साहन”, और वो सब जो कैमरों से छिपा रहता है। आमदनी कितनी? नफा-नुकसान का ऑडिट! तेजस्वी जी ने कितना निवेश किया, मुकेश सहनी जी ने कितना? और रिटर्न? तेजस्वी को कितना मिला, सहनी जी को कितना? बीच में संजय यादव जी का क्या रोल? उनका हाथ कितना “लगा”? आदि-आदि… जैसे कोई कॉर्पोरेट बोर्ड मीटिंग हो, जहां बैलेंस शीट मैच न करे तो “एडजस्टमेंट” की जाती है। हा हा, बिहार की राजनीति में ये “एडजस्टमेंट” ही तो असली कला है!
और ये सिर्फ अटकलें नहीं, कई पत्रकार तो अपने “सूत्रों” (ध्यान दें, मूत्र नहीं, सूत्र!) से इसकी पुष्टि कर रहे हैं। नाम न उजागर करने की शर्त पर, क्योंकि राजनीति में नाम उजागर करना मतलब “राजनीतिक आत्महत्या”। एक पार्टी कार्यकर्ता ने तो ये भी कहा कि “हमें तो ज्यादा जानकारी नहीं, लेकिन तेजस्वी जी अपना ‘काम’ खत्म करके ही सदन आएंगे।” अब “काम” क्या है? सदन का काम, या ये हिसाब-किताब वाला “व्यापारिक काम”?
ये सब देखकर लगता है कि बिहार की राजनीति अब “जनसेवा” से ज्यादा “बिजनेस मॉडल” बन गई है। सत्र पांच दिनों का, लेकिन हिसाब-किताब महीनों का! क्या कहते हो, क्या ये अटकलें सही हैं, या सिर्फ विपक्ष को बदनाम करने की साजिश?