
बिहार
राजनीति में सुर्खियाँ बटोरने के भी अपने-अपने तरीके होते हैं। कोई जनता के बीच जाकर काम करता है, कोई सदन में सवाल उठाता है, कोई सड़क पर संघर्ष करता है और कोई ऐसा भी होता है जो माइक देखते ही ऐसा बोलने लगता है मानो सामने प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, फिल्म का क्लाइमेक्स चल रहा हो!
इन दिनों बिहार की राजनीति में वीआईपी के प्रमुख मुकेश सहनी का नाम इसी अंदाज़ में चर्चा में है।
वीआईपी पार्टी के मालिक मुकेश सहनी ने हाल ही में ऐसा बयान दिया है कि सुनने वाले के कान खड़े हो जाएं। उनका दावा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को गोली मारने के लिए वे पूरी तरह तैयार हैं—बशर्ते हत्या का पाप माफ कर दिया जाए। इतना ही नहीं, उनके एक इशारे पर उनके समर्थक न्यूज चैनलों के स्टूडियो में आग लगा देंगे, स्टूडियो में बैठे एंकरों को भी गोली से भून देंगे। और बस यहीं नहीं रुकते। वे भारत को नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश बना देने का भी वादा करते हैं—यानी उन देशों जैसा गृहयुद्ध खड़ा कर देंगे।

ये सब बातें स्वयं मुकेश सहनी के मुंह से निकली हैं। कांग्रेस के ‘मंडलिकमणि’ और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा चुनाव आयोग पर लगाए गए ‘वोट चोरी’ के आरोपों के समर्थन में उन्होंने न सिर्फ हाथ उठाया, बल्कि एक कदम और आगे बढ़कर पूरी फिल्मी एक्शन सीक्वेंस पेश कर दी।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सहनी की कथित टिप्पणी ने राजनीतिक बहस को अचानक बयानबाजी के उस मुकाम पर पहुँचा दिया, जहाँ लोकतांत्रिक असहमति और बोलबच्चन के बीच की रेखा दिखाई ही नहीं देती।
दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बाद फूलन देवी के वंशज मुकेश सहनी को मीडिया ने हाशिए पर डाल दिया था। सुर्खियां सूख गईं, कैमरे दूसरी तरफ मुड़ गए। ऐसे में मुंबई के फिल्म उद्योग से निकले इस नेता को पुरानी आदत सताने लगी। जहां जमीनी मेहनत से ज्यादा ‘बोल-बच्चन’ चलता है, वहां से आई आदतें राजनीति में भी उसी अंदाज में झलकने लगीं। राहुल गांधी का समर्थन करते हुए उन्होंने बस माइक थाम लिया और फिल्मी स्टाइल में धमाकेदार डायलॉग फेंक दिए—ताकि एक बार फिर सुर्खियां उनके नाम पर लग जाएं।
समाज के लिए जमीनी स्तर का कोई ठोस काम तो दूर की बात, कार्यालय में बैठकर नैतिक-अनैतिक, कानूनी-गैरकानूनी और मर्यादा-अमर्यादा के फर्क से बेखबर सिर्फ जुबान हिलाकर हेडलाइन बटोरने की कोशिश। यही ‘बोल-बच्चन’ अब उनके गले की फांस बनता जा रहा है। जो बातें वे सहज भाव से कह गए हैं, वे बातें अब उन्हें ही कठघरे में खड़ा कर दिया हैं।
प्रदेश की आम जनता इस पूरे प्रकरण को नकारात्मक दृष्टि से देख रही है। लोग सवाल पूछ रहे हैं—‘नेताजी’ की वह गोली और बंदूक उस वक्त कहां थी, जब उनके पड़ोसी ने उनके ही घर में उनके पिता का गला रेत दिया था? जब खुद के आंगन में खून बह रहा था, तब तो बंदूक गायब थी। अब चुनाव आयोग और न्यूज स्टूडियो पर गोली चलाने की धमकी दे रहे हैं। फिल्मी हीरो की तरह डायलॉग तो बहुत जोरदार हैं, लेकिन असल जिंदगी का स्क्रिप्ट कुछ और ही बताता है।
मुकेश सहनी का यह हालिया प्रदर्शन एक बार फिर साबित करता है कि कुछ नेताओं के लिए राजनीति भी फिल्म सेट ही है—जहां धमाकेदार डायलॉग, धमकी और नाटकीयता से सुर्खियां बटोर ली जाती हैं। जमीनी काम, जिम्मेदारी और मर्यादा तो साइड रोल में चले जाते हैं। अब देखना यह है कि यह ‘बोल-बच्चन’ उन्हें सुर्खियों में रखता है या कानूनी और नैतिक कठघरे में।
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