सुशासन की वापसी ?

पटना

बिहार में नई सरकार के गठन के साथ ही राज्य भर में अतिक्रमण हटाओ अभियान जोर-शोर से चलाया जा रहा है। सड़कों, नालों, सरकारी जमीनों और सार्वजनिक स्थलों पर हुए कब्जों को बुल्डोजर के जरिए ध्वस्त किया जा रहा है। सत्ताधारी दल के नेता और समर्थक इसे “सुशासन की वापसी” बताकर जमकर वाहवाही लूट रहे हैं। सोशल मीडिया से लेकर विधानसभा तक, हर जगह यही नारा गूंज रहा है कि “बिहार अब बदल रहा है”।

लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई बिहार की तकदीर और तस्वीर बदलने का सबसे पहला और सबसे जरूरी कदम यही था – बुल्डोजर चलाना?

चुनाव के दौरान जनता के सामने जो घोषणा-पत्र (मेनिफेस्टो) पेश किया गया था, उसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सिंचाई, बिजली, सड़क, अपराध नियंत्रण जैसे मुद्दे प्रमुखता से थे। अतिक्रमण हटाने की कोई स्पष्ट प्राथमिकता या समय-सीमा उसमें कहीं नहीं दिखाई दी। अब अचानक यही काम सबसे ऊपर चला आया। घोषणा-पत्र को किनारे रखकर सुशासन का नया फार्मूला यही निकाला गया कि पहले ढहाओ, फिर दिखाओ।

इस पूरे अभियान से दो बुनियादी सवाल उठ खड़े होते हैं, जिनका ईमानदार जवाब मिले बिना यह “सुशासन” सिर्फ़ दिखावा लगता है।

सरकार के इस कदम से बहुत सारे सवाल खड़े होते हैं। यह अतिक्रमण बिहार के विकास में सबसे बड़ी रुकावट थी क्या? शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अपराध जैसे मूलभूत समस्याओं को पहले निपटाने की बजाय सरकार की पहली प्राथमिकता अतिक्रमण हटाना बन गई। इसका मतलब साफ है – या तो पहले के वादे सिर्फ़ कागजी थे, या फिर अब सत्ता के नशे में जनता के असली दुख-दर्द को भुला दिया गया है।

अगर अतिक्रमण हटाना सचमुच इतना जरूरी और आपातकालीन काम था, तो चुनाव के समय जनता से यह वादा क्यों नहीं किया गया?
जब वोट माँगने का वक़्त था, तब तो बड़े-बड़े सपने दिखाए गए थे। तब अतिक्रमण का जिक्र तक नहीं था। अब वोट मिल गया, कुर्सी मिल गई, तो बुल्डोजर निकल आए। यह दोहरा चरित्र नहीं तो और क्या है?
वादे कुछ और थे, काम कुछ और – क्या यही नया सुशासन है?

दरअसल यह अभियान कम और सत्ता का प्रदर्शन ज्यादा लगता है। गरीब-मजबूर लोग जिन्होंने दशकों से सड़क किनारे छोटी-मोटी दुकान या झोपड़ी बनाकर किसी तरह गुजारा किया था, उन्हें एक झटके में बेघर कर दिया जा रहा है। उनके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं, कोई पुनर्वास का इंतजाम नहीं। सिर्फ़ बुल्डोजर और पुलिस का डंडा।

यह डर और दहशत की राजनीति है। जनता ने विकास और सम्मान माँगा था, सरकार दे रही है बेघरगी और आंसू। जनता ने उम्मीद की थी कि नई सरकार आएगी तो स्कूल-हॉस्पिटल बनेंगे, नौकरियां आएंगी, अपराध रुकेगा। लेकिन सरकार ने तो “ढहाने” का ठेका ले लिया।

सुशासन का मतलब सिर्फ़ तोड़ना-फोड़ना नहीं होता। सुशासन का मतलब है – लोगों को सुरक्षा देना, अवसर देना, सम्मान देना। बुल्डोजर से सिर्फ़ मलबा पैदा होता है, भरोसा नहीं बनता।

अतिक्रमण हटाना जरूरी हो सकता है, लेकिन उससे भी जरूरी है यह बताना कि इसके बाद क्या? बेघर हुए लोगों का पुनर्वास कब? उनकी आजीविका का इंतजाम कब? या सिर्फ़ फोटो खिंचवाकर और वीडियो वायरल करवाकर सुशासन का सर्टिफिकेट बाँट लिया जाएगा?

इस नई सरकार के बारे में इतना ही कहना है कि पूराने माल पर नया लेबल लगा दिया गया है। बिहार की जनता समझदार है। वह बहुत जल्दी समझ जाएगी कि यह सुशासन नहीं, सत्ता का नशा है। और जब जनता समझ जाती है, तो फिर बुल्डोजर कितना भी जोर से चले, जनादेश को नहीं तोड़ पाता।

#बिहार_बदल_रहा_है_या_तोड़_रहा_है
#सुशासन_या_दहशतगर्दी

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