
बिहार
एक प्रसिद्ध हिंदी कहावत है: “नकल में भी अकल की जरूरत पड़ती है।” यह कहावत इस बात की ओर इशारा करती है कि किसी सफल रणनीति या नीति की नकल करते समय भी बुद्धिमत्ता और संवेदनशीलता का प्रयोग आवश्यक है, अन्यथा परिणाम विपरीत हो सकते हैं। बिहार के उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री का पदभार संभालने वाले सम्राट चौधरी ने इस कहावत को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बुलडोजर नीति की अंधाधुंध नकल शुरू कर दी है, लेकिन इसमें आवश्यक बुद्धिमत्ता और स्थानीय परिस्थितियों का ध्यान नहीं रखा जा रहा है। परिणामस्वरूप, यह अभियान बिहार की गरीब और मजदूर वर्ग के लिए एक अतिरिक्त पीड़ा का कारण बन गया है, जैसे कि “कोढ़ में खाज” की स्थिति।
सम्राट चौधरी ने गृह मंत्री बनते ही राज्य के सभी जिलाधिकारियों को सरकारी भूमि पर अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोजर चलाने का सख्त निर्देश जारी कर दिया। इस आदेश के पालन में प्रशासनिक अधिकारी पूरी तरह संवेदनहीन होकर कार्रवाई में जुट गए हैं। वे फुटपाथों पर छोटी-छोटी दुकानें लगाकर परिवार का भरण-पोषण करने वाले गरीब दुकानदारों और सरकारी नालों पर झोपड़ियां बनाकर रहने वाले बेघर लोगों को बेरहमी से उजाड़ रहे हैं। इन कार्रवाइयों में गरीबों की आजीविका और आश्रय दोनों छिन रहे हैं, जिससे उनका जीवन और कठिन हो गया है। वहीं, सत्ताधारी दलों के नेता और कार्यकर्ता इस अभियान को उचित ठहराते हुए सम्राट चौधरी की प्रशंसा कर रहे हैं और उन्हें योगी आदित्यनाथ का “फोटोस्टेट कॉपी” बता रहे हैं। लेकिन क्या यह महज नकल है, या इसमें बिहार की वास्तविक जरूरतों का विचार किया गया है?
बिहार की नवगठित सरकार के इस अतिक्रमण-विरोधी अभियान को देखकर एक बात स्पष्ट हो जाती है कि योगी जी की बुलडोजर नीति की सतही नकल तो की गई है, लेकिन इसमें आवश्यक बुद्धिमत्ता और मानवीय संवेदना का अभाव है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने बुलडोजर का इस्तेमाल मुख्य रूप से बड़े-बड़े माफियाओं, दुर्दांत अपराधियों और अवैध निर्माणों के खिलाफ किया था, जहां यह कार्रवाई कानूनी और सामाजिक न्याय की दृष्टि से उचित साबित हुई। वहां बुलडोजर ने अपराधियों के भव्य भवनों और अवैध साम्राज्यों को ध्वस्त किया, जिससे समाज में कानून का राज मजबूत हुआ। लेकिन बिहार में यह अभियान उलटा पड़ रहा है। यहां बुलडोजर गरीबों के छोटे-मोटे ठिकानों पर चलाए जा रहे हैं, जो राज्य की बेरोजगारी और गरीबी की समस्या को और गहरा रहे हैं। यह अभियान बिहार के मजबूर और मजदूर वर्ग के लिए एक नई विपत्ति साबित हो रहा है, जो पहले से ही पलायन, बेरोजगारी और आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
इस अभियान से कई गंभीर सवाल उठते हैं, जिन्हें देश, काल और पात्र के संदर्भ में तौलने की आवश्यकता है। सबसे पहला और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या बिहार की तकदीर और तस्वीर बदलने का प्राथमिक कदम यही होना चाहिए – गरीबों और बेघरों पर बुलडोजर चलाना? चुनावी घोषणा-पत्र (मेनिफेस्टो) में सत्ताधारी दलों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सृजन, सिंचाई सुविधाएं, बिजली आपूर्ति, सड़क निर्माण और अपराध नियंत्रण जैसे मुद्दों को प्रमुखता से रखा था। इनमें से किसी में भी अतिक्रमण हटाने को प्राथमिकता या समयबद्ध योजना के रूप में उल्लेख नहीं किया गया था। फिर अचानक यह अभियान सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता कैसे बन गया? घोषणा-पत्र को दरकिनार कर “सुशासन” का नया फॉर्मूला यह क्यों निकाला गया कि पहले सब कुछ ढहाओ, फिर सोचो? क्या यह राजनीतिक दिखावा है, या वास्तविक विकास की दिशा में कदम?
दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सम्राट चौधरी की नजर में बिहार के सबसे बड़े “माफिया” या अपराधी कौन हैं? क्या फुटपाथ पर छोटी-छोटी दुकानें लगाने वाले गरीब दुकानदार या नालों पर झोपड़ियां बनाकर रहने वाले बेघर लोग? ये लोग तो राज्य की बेरोजगारी और गरीबी के शिकार हैं, जो मजबूरी में सरकारी भूमि पर छोटे-मोटे धंधे या आश्रय तलाशते हैं। बिहार में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, और लाखों युवा पलायन कर अन्य राज्यों में मजदूरी करने को मजबूर हैं। ऐसे में यह बुलडोजर अभियान उनकी पीड़ा को और बढ़ा रहा है, बजाय कि समाधान देने के। क्या सरकार ने इन गरीबों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था सोची है? जैसे कि पुनर्वास योजना, रोजगार के अवसर या सस्ते आवास? यदि नहीं, तो यह अभियान सरासर अन्यायपूर्ण है। अतिक्रमण हटाना आवश्यक हो सकता है, लेकिन इसे मानवीय तरीके से और विकल्प प्रदान करके किया जाना चाहिए, न कि बेरहमी से उजाड़कर।
यदि योगी आदित्यनाथ की नीति की नकल ही करनी है, तो इसे बुद्धिमत्ता से लागू किया जाना चाहिए। बिहार में गरीबों, मजदूरों और मजबूरों की तकलीफों के प्रति संवेदनशील रहते हुए इस अभियान को चलाया जाए। उदाहरण के लिए, यदि अवैध अतिक्रमण पर कार्रवाई करनी है, तो पहले बड़े पैमाने पर घुसपैठियों जैसे बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों को चिह्नित किया जाए, जो राज्य की बड़ी-बड़ी भूमियों पर कब्जा जमाए हुए हैं। योगी जी ने उत्तर प्रदेश में इसी तरह की कार्रवाई की है, जहां अवैध घुसपैठियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए गए हैं। बिहार में भी यदि यह दिशा अपनाई जाए, तो शायद अभियान अधिक न्यायपूर्ण और प्रभावी साबित हो। लेकिन वर्तमान में जो हो रहा है, वह गरीबों को लक्षित कर रहा है, जबकि बड़े अपराधी और माफिया सुरक्षित हैं।
अंत में, बिहार सरकार को इस अभियान पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। विकास के नाम पर गरीबों को उजाड़ना कोई समाधान नहीं है; बल्कि यह राज्य की सामाजिक-आर्थिक असमानता को और बढ़ाएगा। नकल में अकल लगाकर, स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखकर और मानवीय संवेदना को प्राथमिकता देकर ही कोई नीति सफल हो सकती है। अन्यथा, यह अभियान बिहार के लोगों के लिए एक नई समस्या बनकर रह जाएगा।
बाबा योगी जी की नकल करनी ही थी तो पूरी नकल करते न! उत्तर प्रदेश में बांग्लादेशी-रोहिंग्या घुसपैठियों को चिह्नित कर उनके अवैध कब्जे हटाए जा रहे हैं। बिहार में भी लाखों एकड़ जमीन पर अवैध घुसपैठिये काबिज हैं।
वहाँ बुलडोजर क्यों नहीं चल रहा?
बिहार के गरीब, मजदूर, रिक्शा वाला, ठेले वाला, फुटपाथी दुकानदार – ये कोई माफिया नहीं हैं।
ये वो लोग हैं जो बिहार की मजबूरी का चेहरा हैं।
इनके ऊपर बुलडोजर चलाकर आप “सुशासन” नहीं, “अत्याचार” दिखा रहे हैं।
अगर अतिक्रमण हटाना ही है तो पहले विकल्प दो। नहीं तो ये बुलडोजर जनता के दिलों पर भी चल जाएगा और लोग २०२५ का चुनाव याद रखेगा कि बुलडोजर किस पर चला था।
कृपया इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
बिहार के गरीबों की आवाज बनें।