चाणक्य नीति और अन्य भारतीय धर्मग्रंथों के नीतिसार अध्याय में स्पष्ट कहा गया है

पटना

“दुर्बलस्य बलं राजा”। अर्थात् दुर्बलों का बल राजा होता है। शासन की सार्थकता इसी में है कि जो व्यक्ति आर्थिक, सामाजिक या परिस्थितिजन्य रूप से कमजोर है, उसके लिए सरकार सहारे की तरह खड़ी हो; उसके अधिकारों की रक्षा करे और उसे भय, अन्याय तथा असुरक्षा से मुक्ति दिलाए।
दुर्भाग्यवश, महाराष्ट्र की वर्तमान तिपहिया सरकार (भाजपा + शिवसेना शिंदे गुट + राष्ट्रवादी कांग्रेस अजित पवार गुट) भाषा के नाम पर इस नीति के ठीक विपरीत कार्य कर रही है।ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा सीखने की अनिवार्यता को लेकर उठे विवाद ने इसी मूल भावना के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है।
महाराष्ट्र सरकार के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक की ओर से परिवहन विभाग के माध्यम से ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा सीखने की अनिवार्यता को लेकर जिस तरह सख्ती की बात सामने आ रही है, उससे विशेष रूप से परप्रांतीय मेहनतकश चालकों में रोजी-रोटी को लेकर चिंता पैदा होना स्वाभाविक है। नियम का पालन न करने पर लाइसेंस अथवा परमिट रद्द किए जाने जैसी कार्रवाई की चर्चा हो, तो एक साधारण मेहनतकश व्यक्ति के मन में भय पैदा होना कोई असामान्य बात नहीं है।
सरकार की ओर से इसका उद्देश्य यात्री और चालक के बीच संवाद बेहतर करना, मराठी भाषा के सम्मान को बढ़ाना तथा महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करना बताया जा रहा है। यदि उद्देश्य वास्तव में यही है, तो मराठी भाषा के सम्मान और प्रचार का स्वागत होना चाहिए। भाषा किसी भी समाज की आत्मा होती है और अपनी भाषा, संस्कृति तथा परंपरा के प्रति सम्मान रखना प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है।
मुंबई और महाराष्ट्र जैसे बहुभाषी एवं बहुसांस्कृतिक प्रदेश में रहने वाला शायद ही कोई समझदार व्यक्ति मराठी भाषा के सम्मान से इनकार करेगा। लाखों परप्रांतीय नागरिकों ने मराठी सीखी है, बोलते हैं और अपने दैनिक जीवन में उसका इस्तेमाल करते हैं। अनेक लोगों के लिए मराठी केवल महाराष्ट्र की भाषा नहीं, बल्कि उनके जीवन और रोजी-रोटी से जुड़ी भाषा बन चुकी है।
हाँ, कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो परिस्थितियों, शिक्षा, उम्र, काम की प्रकृति अथवा अन्य कारणों से अभी तक मराठी में दक्ष नहीं हो पाए हैं। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि वे मराठी भाषा या महाराष्ट्र की संस्कृति का अपमान करते हैं।
मुंबई में रोजी-रोटी कमाने आया कोई व्यक्ति मराठी सीख ले तो उसका संसार निश्चित रूप से व्यापक होता है। वह स्थानीय समाज से बेहतर जुड़ता है, संवाद आसान होता है और सामाजिक-सांस्कृतिक समझ भी बढ़ती है। इसलिए मराठी सीखने को प्रोत्साहित करने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती। असली सवाल है—प्रोत्साहन का रास्ता अपनाया जाएगा या भय और दंड का?
यहीं से सरकार की नीति और उसकी प्राथमिकताओं पर सवाल उठता है।
क्या परिवहन विभाग के सामने आज सबसे बड़ी समस्या केवल ‘यात्री-चालक संवाद’ ही है? क्या परमिट, भ्रष्टाचार, यातायात व्यवस्था, यात्रियों की सुरक्षा, अवैध वसूली, सार्वजनिक परिवहन की गुणवत्ता और चालकों की आर्थिक समस्याएँ पीछे छूट गई हैं और मराठी भाषा ही विभाग की सबसे बड़ी चिंता बन गई है?
यदि मराठी भाषा और महाराष्ट्र की संस्कृति का सम्मान सुनिश्चित करना ही उद्देश्य है, तो सवाल यह भी उठना स्वाभाविक है कि इस प्रकार की सख्ती केवल ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के मामले में ही क्यों दिखाई देती है? महाराष्ट्र के अलग-अलग क्षेत्रों में दुकानों, छोटे कारोबारों, निर्माण कार्यों, कारखानों, घरेलू सेवाओं और अन्य अनेक व्यवसायों में भी अलग-अलग राज्यों से आए लोग काम करते हैं।
फिर भाषा के सम्मान का दायित्व केवल उस गरीब ऑटो चालक के कंधे पर ही क्यों रखा जाए, जिसकी रोज की कमाई से उसके परिवार का चूल्हा जलता है?
सरकार का काम कमजोर व्यक्ति को डराना नहीं, उसका डर दूर करना है।
अगर कोई ऑटो चालक रोज सुबह अपने वाहन की किस्त, घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई और परिवार के भोजन की चिंता लेकर सड़क पर निकलता है, तो उसके लिए लाइसेंस या परमिट रद्द होने की आशंका केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं होती—वह उसके पूरे परिवार की आजीविका पर संकट बन सकती है।
यही वह बिंदु है जहाँ “दुर्बलस्य बलं राजा” की नीति हमें शासन के मूल धर्म की याद दिलाती है।
भाषा ईंट है—पुल भी बनाती है और दीवार भी।
भाषा को लेकर एक बात विशेष रूप से समझने की आवश्यकता है।
भाषा ईंट की तरह होती है।
ईंटों से चाहें तो दो किनारों को जोड़ने वाला पुल बनाया जा सकता है और चाहें तो दो लोगों, दो समाजों तथा दो समुदायों को अलग करने वाली दीवार भी खड़ी की जा सकती है।
मराठी भाषा भी ऐसी ही एक मजबूत ईंट है।
इसी ईंट से महाराष्ट्र की संस्कृति और देश के दूसरे हिस्सों से आए लोगों के बीच प्रेम, संवाद और आत्मीयता का पुल बनाया जा सकता है। लेकिन यदि उसी भाषा को भय, दंड, लाइसेंस और परमिट रद्द करने की धमकी से जोड़ दिया जाए, तो वही ईंट धीरे-धीरे एक ऐसी दीवार का रूप ले सकती है, जिसके एक तरफ ‘स्थानीय’ और दूसरी तरफ ‘परप्रांतीय’ खड़े दिखाई देने लगेंगे।
इसलिए फरमान जारी करने वालों को यह तय करना होगा कि वे भाषा रूपी ईंट से पुल बना रहे हैं या दीवार?
मराठी को सम्मान दिलाने का सबसे प्रभावी तरीका यह नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति भय के कारण मराठी बोले; बेहतर यह होगा कि वह प्रेम, आवश्यकता और आत्मीयता के कारण मराठी सीखे।
डर से निकला शब्द संवाद नहीं बनाता, दिल से निकली भाषा संबंध बनाती है।
महाराष्ट्र की महानता उसकी मराठी भाषा में तो है ही, लेकिन उसकी महानता इस बात में भी है कि उसने देश के अलग-अलग हिस्सों से आए करोड़ों लोगों को अपने भीतर स्थान दिया है। मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी बनाने में केवल मराठी समाज का नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के मेहनतकश लोगों के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों से आए श्रमिकों, व्यापारियों, कर्मचारियों, टैक्सी-ऑटो चालकों और छोटे-बड़े उद्यमियों का भी योगदान रहा है।
इसलिए भाषा का सम्मान हो—अवश्य हो।
मराठी सीखी जाए—अवश्य सीखी जाए।
महाराष्ट्र की संस्कृति का सम्मान हो—अवश्य हो।
लेकिन यह सब प्रेम और प्रोत्साहन से हो, भय और दंड से नहीं।
सरकार को यह भी याद रखना चाहिए कि सत्ता का वास्तविक अर्थ आदेश जारी करना नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के साथ खड़ा होना है।
यदि किसी नीति के कारण मेहनतकश वर्ग के मन में यह भय पैदा होने लगे कि उसकी रोजी-रोटी खतरे में पड़ सकती है, तो सरकार को उस नीति के उद्देश्य के साथ-साथ उसके सामाजिक प्रभाव की भी समीक्षा करनी चाहिए।
राजनीति के लिए भाषा का इस्तेमाल मतभेद पैदा करने में नहीं, मन जोड़ने में होना चाहिए।
किसी भी राजनीतिक दल या सरकार को यह समझना चाहिए कि भाषा के नाम पर पैदा किया गया तनाव अंततः समाज के लिए ही नुकसानदेह होता है। आज यदि भाषा के आधार पर एक वर्ग असुरक्षित महसूस करता है, तो कल यही असुरक्षा दूसरे वर्गों तक भी पहुँच सकती है।
महाराष्ट्र की पहचान विविधता, सहिष्णुता, उद्यमिता और समावेशिता से बनी है। मुंबई की पहचान तो विशेष रूप से ऐसी ही रही है—जहाँ देश के अलग-अलग कोनों से आया व्यक्ति मेहनत करता है, सपने देखता है और अपने भविष्य का निर्माण करता है।
इसलिए सरकार से अपेक्षा है कि वह भाषा को संबंधों की सेतु बनाए, विभाजन की दीवार नहीं।
क्योंकि नीति का उद्देश्य यदि समाज को जोड़ना है, तो भाषा को पुल बनना चाहिए; और यदि भाषा के नाम पर भय पैदा होने लगे, तो वही भाषा अनजाने में दीवार बनने लगती है।
अंततः प्रश्न केवल मराठी सीखने का नहीं है।
प्रश्न यह है कि मराठी सिखाने का तरीका क्या होगा—सम्मान से या डर से?
और शायद इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा उत्तर यही है—
“दुर्बलस्य बलं राजा”—राजा अर्थात सरकार का धर्म है कि वह दुर्बल का सहारा बने, उसकी रोजी-रोटी का संकट न बढ़ाए।
भाषा का सम्मान दिल से हो, डर और दंड से नहीं।
मराठी से प्रेम बढ़ाइए, मराठी के नाम पर भय नहीं।
भाषा की ईंट से पुल बनाइए—दीवार नहीं!

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