
बिहार
बिहार की राजनीति को पिछले डेढ़ दशक से गौर से देखिए। ऐसा लगता है कि सत्ता के गलियारों में जातिवादी कीचड़ से मानसिक रोगी उत्पन्न होता रहा है।
जातिवादी सत्ता के संपर्क एवं संरक्षण में समय-समय पर ऐसे-ऐसे मानसिक रोगी समाज के सामने आते रहे हैं, जिन्हें जातीय नफरत फैलाने, दूसरे समाज को गाली देने, धार्मिक आस्था का अपमान करने और सार्वजनिक मर्यादा की धज्जियां उड़ाने में ही अपना पुरुषार्थ दिखाई देता है।
नीतीश कुमार के शासनकाल में पूर्व विधायक गोपाल मंडल और श्याम बहादुर सिंह जैसे चेहरे सार्वजनिक मंचों पर अपने आचरण को लेकर चर्चा में रहे। नर्तकियों के साथ अशोभनीय हरकतें हों या सार्वजनिक मर्यादा की सीमाएं लांघने वाले कारनामे—ऐसे दृश्य देखकर यही लगता था कि राजनीति में पद तो मिल गया, लेकिन मर्यादा का पासवर्ड कहीं रास्ते में ही छूट गया!
फिर सत्ता का समीकरण बदला।
तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव के सत्ता के केंद्र में आने और नीतीश कुमार के साथ रहने के दौर में सोशल मीडिया के अखाड़े में महामूरख एवं महात्वाकांक्षी संतोष रेणु यादव और यौन कुंठित किरण यादव जैसे चेहरे भी उभरे।
एक तरफ महात्वाकांक्षा ऐसी कि लगता था बिहार की राजनीति का सूर्योदय और सूर्यास्त अब सोशल मीडिया पोस्ट से ही होगा; दूसरी तरफ भाषा ऐसी कि सभ्यता और संस्कार दोनों अपना सिर पकड़ लें!
ब्राह्मणों और क्षत्रियों को गाली देना, हिंदू देवी-देवताओं पर अनर्गल टिप्पणियां करना, धर्मग्रंथों और धर्माचार्यों के बारे में उल-जुलूल बोलना—मानो गाली ही विचारधारा हो और धार्मिक अपमान ही क्रांति का प्रमाणपत्र!
सत्ता का समीकरण बदला तो एक ‘महान क्रांतिकारी’ का मिजाज भी कुछ हद तक अपनी जगह आया। मगर दूसरी ओर कांव-कांव का लाउडस्पीकर अब भी चालू है।
अब सत्ता सम्राट चौधरी के हाथ में आई तो सोशल मीडिया के इसी जातीय अखाड़े में गोल्डेन दास और रुद्र प्रताप कुशवाहा जैसे नए ‘योद्धा’ दिखाई देने लगे।
इनका भी फॉर्मूला पुराना है—
ब्राह्मण को गरियाओ, क्षत्रिय को गरियाओ, हिंदू देवी-देवताओं पर अनर्गल बोलो और फिर खुद को बहुजन हितैषी घोषित कर दो!
वाह!
गाली = सामाजिक न्याय,
जातीय नफरत = बहुजनवाद,
धार्मिक अपमान = क्रांतिकारी विचार,
और दूसरे समाज को नीचा दिखाना = पुरुषार्थ!
ऐसे मानसिक रोगियों को शायद कोई समझाने वाला नहीं मिला कि किसी जाति को गाली देने से अपनी जाति महान नहीं हो जाती।
सवाल यह भी है कि जब कोई व्यक्ति लगातार सोशल मीडिया पर जातीय और धार्मिक वैमनस्य का जहर उगलता है, तब सत्ता और प्रशासन की निगाहें क्यों कमजोर पड़ जाती हैं?
क्या सजातीय होने के कारण समाज में जहर घोलने वाले इन मानसिक रोगियों के लिए कानून की धाराएं भी ‘सॉफ्ट मोड’ में चली जाती हैं?
अब आते हैं ‘इलाज’ पर!
कुछ दिन पहले रुद्र प्रताप कुशवाहा के साथ हुई मारपीट के वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों ने अपने अंदाज में इसे ‘लात-जूता पद्धति’ का नाम दे दिया—मानो एलोपैथी और होम्योपैथी के बाद बिहार ने अपनी देसी मेडिकल साइंस भी खोज निकाली हो!
लेकिन उसके बाद भी यदि वही भाषा, वही जातीय जहर और वही आपत्तिजनक बयानबाजी जारी है, तो व्यंग्य में इतना तो कहना ही पड़ेगा—
इलाज हुआ जरूर, लेकिन लगता है बीमारी की गंभीरता के हिसाब से डोज थोड़ी कम पड़ गई!
मरीज पुराना है,
बीमारी पुरानी है,
लक्षण पुराने हैं,
और मानसिक रोग भी बार-बार अपना ‘रिपीट टेलीकास्ट’ कर रहा है।
तो फिर सवाल बनता है—
इलाज में कहीं कोताही तो नहीं हुई?
लेकिन मजाक अपनी जगह और कानून अपनी जगह। किसी व्यक्ति के साथ मारपीट किसी बीमारी का स्थायी इलाज नहीं है। सजा देने का अधिकार अदालत का है, समाज का नहीं।
और असली बीमारी किसी एक व्यक्ति तक सीमित भी नहीं है।
असल बीमारी उस राजनीतिक वातावरण में है, जहां जातिवादी कीचड़ को खाद-पानी मिलता है।
सत्ता बदलती है तो चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन यदि राजनीतिक संस्कृति नहीं बदली तो कीचड़ वही रहता है और अगला मानसिक रोगी उसी कीचड़ से निकल आता है।
यही सबसे बड़ी समस्या है।
सत्ता से जुड़े जातिवाद के कीचड़ से उत्पन्न इस मानसिक बीमारी को केवल सत्ता के माध्यम से सुलझा लेना आसान नहीं है।
क्योंकि जिस व्यवस्था में जातीय पहचान वोट का गणित बन जाए, वहां जातीय नफरत फैलाने वाले लोग कभी-कभी समस्या नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरण का हिस्सा बना दिए जाते हैं।
आज कोई ब्राह्मण-क्षत्रिय को गाली देकर बहुजन हितैषी बनता है, कल कोई दूसरी जाति को गाली देकर अपना सामाजिक योद्धा बन जाएगा और परसों कोई तीसरा व्यक्ति किसी और समुदाय को निशाना बनाएगा।
चेहरा बदलेगा, झंडा बदलेगा, सत्ता बदलेगी—लेकिन जातिवादी कीचड़ वही रहेगा।
इसलिए इलाज भी लंबा चलेगा।
कानून की दवा चाहिए।
सामाजिक चेतना का इंजेक्शन चाहिए।
राजनीतिक इच्छाशक्ति की सर्जरी चाहिए।
और सबसे ज्यादा जरूरत है—जातीय नफरत की राजनीति को सामाजिक अस्वीकृति देने की।
क्योंकि ‘लात-जूता पद्धति’ से शरीर पर लगी चोट शायद कुछ दिनों में ठीक हो जाए, लेकिन दिमाग में वर्षों से जमा जातीय जहर उससे नहीं निकलता।
और जो व्यक्ति लगातार जातीय घृणा, धार्मिक अपमान और सामाजिक वैमनस्य फैलाने को अपना पुरुषार्थ समझता है, उसके लिए बेबाक बिहारी की एक ही सलाह है—
पहले अपनी भाषा का इलाज कराइए,
फिर समाज को सुधारने का ठेका लीजिए!
बिहार को ऐसे महामूर्ख, महात्वाकांक्षी और मानसिक रोगी जातीय योद्धाओं की जरूरत नहीं है, जो दूसरे समाज को गाली देकर स्वयं को महान समझते हैं।
बिहार को चाहिए—
विचार, विकास और सामाजिक सद्भाव।
गाली नहीं, संवाद।
नफरत नहीं, न्याय।
जातीय युद्ध नहीं, बिहार का विकास।
और सत्ता चाहे जिसकी हो—
जातीय कीचड़ से निकलने वाले हर मानसिक रोगी पर सवाल होगा।
बेबाक सवाल होगा।
और सवाल सत्ता से भी होगा कि आखिर इस कीचड़ की फैक्ट्री पर ताला कब लगेगा?
यही है बेबाक बिहारी का सवाल।
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