विगत रविवार, ०७ सितंबर २०२६ को मुंबई-ठाणे के दही-हांडी उत्सव

मुंबई-ठाणे

विगत रविवार, ०७ सितंबर २०२६ को मुंबई-ठाणे के दही-हांडी उत्सव के मंच पर एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसमें मनोरंजन भी था, मुस्कान भी थी और महाराष्ट्र की राजनीति में भाषा-नीति का एक बेहद दिलचस्प चेहरा भी दिखाई दिया।
मंच पर मौजूद शिवसेना विधायक सह महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त से मराठी में बोलने की नसीहत दे डाली।
संजय दत्त ने माइक संभाला, हँसे और फिर जो जवाब दिया, उसने पूरे माहौल को ठहाकों में बदल दिया। दिलचस्प बात यह रही कि मंत्री महोदय भी नाराज़ होने के बजाय मुस्कुराते और हँसते नजर आए।
यानी मामला वहीं खत्म—न कोई फरमान, न कोई चेतावनी, न कोई परमिट का संकट… बस मुस्कान, ठहाका और तालियाँ!
पूरा किस्सा नीचे दिए गए वीडियो में दर्ज है।
लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि संजय दत्त ने मराठी बोली या नहीं।
सवाल यह भी नहीं है कि मंत्री जी उनके जवाब पर क्यों हँसे।
असली सवाल है—नियम-कायदे आखिर किसके लिए हैं और उनके इस्तेमाल का पैमाना क्या है?
क्योंकि यही परिवहन विभाग कुछ ही समय पहले मुंबई में रोजी-रोटी कमाने वाले ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए कामचलाऊ मराठी सीखने का फरमान लेकर आया था। बात सिर्फ भाषा सीखने तक नहीं रुकी थी; नियम न मानने पर परमिट और रोजगार पर कार्रवाई का खतरा भी बताया गया था।
गरीब ऑटो-टैक्सी चालक के लिए भाषा बनी—नियम।
नियम बना—फरमान।
फरमान बना—परमिट का डर।
लेकिन जब वही भाषा का सवाल बॉलीवुड के बड़े सितारे के सामने आया तो…
फरमान फुलझड़ी बन गया,
कानून मुस्कुराने लगा,
और कार्रवाई कहीं छुट्टी पर चली गई!
मंत्री जी के मनसूबे पर पानी फेरते हुए अभिनेता ने हँसते हुए जवाब दिया और मंत्री जी भी मुस्कुराकर रह गए।
वाह रे व्यवस्था!
गरीब के लिए—
नियम, कानून, परमिट और कार्रवाई।
रसूखदार के लिए—
मजाक, मुस्कान और तालियां!
यही तो है हमारे लोकतांत्रिक ‘बराबरी’ का नया संस्करण—
कानून सबके लिए बराबर है, बस उसे लागू करने का तरीका अलग-अलग है!
वैसे इस पूरे दृश्य को देखकर अनायास ही मनोज तिवारी का वह मशहूर भोजपुरी गीत याद आ जाता है—
“हीं हीं, हीं हीं हंस दिहले… रिंकिया के पापा!”
अब सवाल यह है कि अगर भाषा के सम्मान और मराठी सीखने का उद्देश्य वास्तव में इतना ही गंभीर है, तो फिर उसकी गंभीरता चेहरा देखकर क्यों बदल जाती है?
क्या मुंबई की सड़कों पर दिन-रात मेहनत करके परिवार पालने वाला ऑटो-टैक्सी चालक ही भाषा के सम्मान का सबसे आसान निशाना है?
क्या नियम-कानून की तलवार सिर्फ उन्हीं के ऊपर चलनी चाहिए, जिनके पास न राजनीतिक पहुँच है, न फिल्मी रसूख और न ही सत्ता के गलियारों तक पहुँच?
भाषा सीखना अच्छी बात है। स्थानीय भाषा का सम्मान करना उससे भी अच्छी बात है। लेकिन भाषा को संवाद का माध्यम बनाइए, डर और दंड का हथियार नहीं।
भाषा एक तरह से ईंट की तरह होता है। इससे एक दूसरे को जोड़ने के लिए पुल भी बनता है और इसी से एक-दूसरे को अलग करने के लिए दीवार भी बनता है।
और अगर नियम बनाना ही है, तो नियम ऐसा हो जो गरीब और रसूखदार दोनों पर समान रूप से लागू हो।
वरना जनता यही पूछेगी—
“मंत्री जी, मराठी गरीब के लिए परीक्षा है या सितारों के लिए सिर्फ हँसी-मजाक?”
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज सिर्फ गलत कानून नहीं होती…
सबसे खतरनाक होता है—एक ही कानून के लिए दो अलग-अलग पैमाने!
और जब कानून के तराजू के एक पलड़े में गरीब ड्राइवर और दूसरे पलड़े में रसूखदार बैठा हो, तो तराजू का झुकना अपने आप बहुत कुछ कह देता है।
यही दोहरे मापदंड का असली चेहरा है।
गरीब के लिए फरमान…
रसूखदार के लिए मुस्कान!

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