मूर्खता की पराकाष्ठा न पुनौरा, न सीतापुरम ,सीतामढ़ी धाम ।

सीतामढ़ी

सीतामढ़ी धाम ही होना चाहिए, न पुनौरा, न सीतापुरम। दक्षिण भारत के तर्ज पर सीतापुरम नाम रखना उचित नहीं है। हम मिथिला के लोग हैं, मिथिला की संस्कृति और मिथिला की बोली ही मधुर है। कुछ स्वार्थी तत्वों ने विवादास्पद कथावाचक रामभद्राचार्य को आगे करके सीता जन्मभूमि पुनौरा को बताया है, जबकि पुनौरा पुंडरीक ऋषि का आश्रम था। एक राजा की पुत्री का आश्रम में प्रकट होना लोकाचार से भी सही नहीं है। सीतामढ़ी नाम से ही भगवती सीता का बोध होता है। ऐतिहासिक, पौराणिक और ऋषियों के महावाक्यों से सीतामढ़ी धाम हि सिद्ध होता है। यह वही पूर्ण्यारण्य है, जहाँ के पशु-पक्षी, जड़-चेतन तथा कण-कण में भगवती सीता बिराजती हैं तथा विहार करती हैं।
रामभद्राचार्य शास्त्र विरुद्ध आचरण करने वाला सरकारी दलाल है। विद्वान कभी भी न्याय के पथ को छोड़कर शास्त्र विरुद्ध आचरण नहीं करता। कौन है रामभद्राचार्य? सीतामढ़ी के विषय में क्या जानता है? विषयानुरागी स्वयं को पंडित मानने वाला अहंकारी है। सीतामढ़ी के राजनीतिक और सामाजिक लोग भी छूद्र पद प्रतिष्ठा के वास्ते इनके आगे पीछे घूमते रहते है संत हृदय कोमल होता है, वह कभी भी परंपरा और शास्त्र विरुद्ध बात कर ही नहीं सकता। यदि सीतापुरम या पुनौरा या अन्य नाम रखा गया तो अशुभ होगा और समय-समय पर इसका दुष्परिणाम देखने को मिलेगा। अभी भी समय है, भारत सरकार और बिहार सरकार को संज्ञान में लेकर सीतामढ़ी धाम को गजट में लाना चाहिए और सीतामढ़ी धाम पर ही मोहर लगानी चाहिए। सीतामढ़ी के MLA, MP तथा यहाँ के प्रबुद्ध जनता भी रामभद्राचार्य के झांसे में आने से वंचित नहीं है। जैसे राम जन्मभूमि अयोध्या धाम है उसी तर्ज पर सीता जन्मभूमि सीतामढ़ी धाम ही होना चाहिए।
डॉ बलवंत शास्त्री
(राष्ट्रीय नेता, भाजपा)

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